पोस्ट --( 240 )-- श्री गर्ग संहिता ~परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण चन्द्र की विजय गाथा - ( ४० ) कृष्णास्त्र से प्रकट हुए भगवान श्री कृष्ण द्वारा उत्कच दैत्य के भाई मायावी शकुन का भीषण युद्ध के बाद युक्तिपूर्वक वध - विद्याधर की पुत्री से विवाह और विश्व विजय के बाद प्रद्युम्न की द्वारिका वापसी और भव्य स्वागत ।
- गर्ग संहिता - विश्वजीत खण्ड - अध्याय -- 32 से 48 तक --
💞 विश्वविजय अभियान में जब प्रद्युम्न जी को पता चला के हिरण्याक्ष का पुत्र , #उत्कच दैत्य जिसे बचपन मे श्री कृष्ण ने छकड़े पर मारा था , उसका भाई मायावी ""#शकुनि ""अपने 5 भाइयों सहित ऋषियों को बहुत परेशान कर रहा है तब उन्होंने शकुनि के राज्य चंद्रावतीपुरी पर आक्रमण किया - दैत्यराज शकुनि के सभी 5 भाइयो इष्ट ,वृक ,कालनाभ ,महानाभ ,हृषिमशु के वध के बाद प्रद्युम्न और शकुनि का घोर युद्ध हुआ --
🌹 शकुनि ने घोर मायावी भयँकर युद्ध किया ,और मय दैत्य द्वारा सिखाई गयी #दैत्यीयमाया प्रकट की -माया से प्रलयकाल के संवर्तक मेघगणो ने आकर हाथी की सूंड के समान मोटी मोटी जलधाराओं से वृष्टि की -प्रचंड आंधी और जल से यादवों के आत्मीयजनों सहित सारे वृक्ष डूब गए , सभी यादव भयभीत होकर कृष्ण कृष्ण पुकारने लगे -तब #प्रद्युम्न ने प्रचंड पराक्रम के आश्रयभूत को दण्ड पर बाण चढ़ाकर , सहसा " #कृष्णास्त्र " का संधान किया --
💞 🎆 "" कृष्णास्त्र ""के संधान होते ही वहां एक #तेजपुंज प्रकट हुआ , उस तेजपुंज के अंदर चार भुजाधारी श्री कृष्ण भगवान दृष्टिगोचर हुए --सभी यादवों ने प्रभु को प्रणाम किया - श्री कृष्ण ने अपने शारंग धनुष पर बाण चढ़ाकर , शकुनि की माया सहित उसका धनुष भी काट दिया -तब शकुनि लज्जित होकर वहाँ से अपने नंगर में भाग गया --
🎃 श्री हरि ने सभी को शकुनि का रहस्य बताया कि इसने भगवान शिव की तपस्या करके वर पाया है कि मरने के बाद भी #भूतल का स्पर्श करते ही यह फिर #जीवित हो जाएगा और आकाश में भी दो घड़ी तक नही मरेगा - इसका जीवन एक #तोते , जिसे इसको शिव जी ने दिया है के जीवन पर निर्भर है - तोते के मरने के बाद
ही इसकी मृत्यु होगी -
🎈 भगवान ने गरुड़ को आदेश दिया कि वह दैत्यों द्वारा सुरक्षित चंद्रावती पूरी में , शकुनि के महल के भीतर जाकर तोते के पिंजरे को तलाश करे और उस सुरक्षित तोते को मार डाले --गरुड़ अत्यंत छोटे रूप में शकुनि के महल में गए , वहां चिंताग्रस्त अपनी पत्नी को शकुनि समझा रहा था कि युद्ध मे उसकी मृत्यु सम्भव ही नही है , चन्द्र नामक उपद्वीप में सुंदर पतंग पर्वत पर उसका जीव रूपी तोता विद्यमान है और शंखचूड़ नामक सर्प उसकी दिन रात रक्षा करता है
🎃 काफी तलाश करने के बाद गरुड़ उस तोते के पास प्नहुँचे और पिंजरा लेकर उड़ चले - दैत्य शकुनि ने पता चलते ही वहां पहुंच कर गरूड से युद्ध किया परंतु गरुड़ ने पिंजरा सहित तोता पहाड़ पर गिरा दिया जिससे तोता मर गया -
🍎 फिर युद्ध में , प्रभु के बाणों से मरकर भी जमीन पर गिरते ही दैत्य शकुनि जिंदा हो जाता था , #सातबार वह मर कर #जीवित हुआ -- तब भगवान ने #युक्तिपूर्वक उसका वध किया -- प्रभु ने महासमर में मरे हुए शकुनि को बलपूर्वक आकाश में फेंक दिया और यादवों से कहा -
🎃-" तुम लोग इसके शरीर को बाणों से बराबर ऊपर फेंकते रहो -" इस प्रकार दो घड़ी तक उसके शरीर को जमीन पर नही गिरने दिया फिर बाण से आसमान में घूमा कर समुद्र में गिरा दिया ,तब उसकी मृत्यु हुई --
🍎 शकुनि की पत्नी मदालसा ने अपने बालक पुत्र के साथ आकर प्रभु की बहुत स्तुति की तब श्री कृष्ण ने उसके बालक पुत्र को चंद्रावतीपुरी का राजा बनाया तथा करुणा करके उस बालक को वैराग्यपूर्ण ज्ञान और भक्ति के साथ ही #कल्पपर्यंत कि लम्बी #आयु प्रदान की --
♥️ भगवान श्री कृष्ण के द्वारका जाने के बाद बसंतमालती नामक नगरी में #पतंग नाम के महाबली #गन्धर्वराज से प्रद्युम्न का भीषण युद्ध हुआ -उसी समय द्वारिकापुरी से एक महान तेज आ पहुँचा-- -उसमे से श्री बलराम जी प्रकट हुए-- बलराम जी ने गन्धर्वो को बुरी तरह परास्त किया और तब गन्धर्वराज ने स्तुति करके भेंट प्रदान की -
🌋🍍 देवराज इंद्र ने आकर प्रद्युम्न से भेंट कर बताया कि स्वर्णगिरि के शिखरों पर लीलावती नामक नगरी में विद्याधरों के राजा #सुकृति अपनी " #सुंदरी " नाम वाली कन्या का स्वयम्वर कर रहे है , उस कन्या का निश्चय है कि जिसे देखकर वह मूर्छित हो जाएगी , उसी से विवाह करेगी - इंद्र के बताए नगर में स्वयम्वर में प्रद्युम्न गए और दिव्य आसन पर बैठे -
🎆 सच मे प्रद्युम्न के पास पँहुचने पर वह विद्याधरी कन्या बेहोश हो गयी - और फिर विवाह का मंगलमय कार्य भी सम्पन्न हुआ --
🍎 उस स्वयम्वर के बाद श्री प्रद्युम्न जी ने सम्पूर्ण इलावर्त खण्ड पर विजय प्राप्त करके फिर वे भारतवर्ष को वापस चले - श्री उद्धव जी ने पहले ही पंहुचकर विश्व विजय करने का सम्पूर्ण समाचार द्वारिका में राजसभा में विस्तार से बताया -- प्रद्युम्न ने जाकर श्री बलराम जी ,अपने पिता श्री कृष्ण जी, राजा उग्रसेन , गुरु श्री गर्गाचार्य जी आदि वरिष्ठ जनों को प्रणाम किया -राजा उग्रसेन ने , प्रद्युम्न की भूरि भूरि प्रशंशा की व वैदिक मंत्रों और ब्राह्मणों के सहयोग से विधिवत पूजन करके ,प्रद्युम्न को हाथी पर बिठा करके , मान और समान के साथ द्वारिकापुरी में ले गए - घर घर मंगल उत्सव हुआ --
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