पोस्ट -( 238 )-- श्री गर्ग संहिता ~ परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान की विजय गाथा - (३८ ) श्री कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न का विश्व विजय अभियान -🎆 प्रद्युम्न ने अपने बाण से द्विविद को बींधकर ,उस बाण से उसे आकाश में आधे पहर तक घुमाकर ,सौ योजन दूर लंका में गिरा दिया - लंकापति विभीषण द्वारा प्रद्युम्न का पूजन और बहुमूल्य वस्तुओं को भेंट करना -- श्री गर्ग संहिता -- विश्वविजित खण्ड -- अध्याय 13 से 21 तक --
🍓 द्वारिका के राजा #उग्रसेन के #राजसूय यज्ञ में विश्व विजय के लिए निकली यादव सेना के सेनापति श्री कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न ने अपनी विजय पताका फहराते हुए , कृतमाला और ताम्रपर्णी नदियों में स्नान करके वे सब राजपुर प्नहुँचे , वहां के राजा शाल्व ने यादवों की सेना का सामना करने के लिए वानर राज द्विविद को बुलाया।
🎃 काफी देर तक हुए युद्ध के बाद प्रद्युम्न ने अपने बाण से द्विविद को बींधकर ,उस बाण से उसे आकाश में आधे पहर तक घुमाकर ,सौ योजन दूर लंका में गिरा दिया -- फिर विजय का दुंदुभिनाद करके शाल्व से भेंट लेकर प्रद्युम्न ने मल्ल देश के अधिपति रामकृष्ण पर विजय पाई - फिर वे सब सेतुबंध तीर्थ पर गए -
फिर उद्धव से सलाह लेकर ,हरि स्वरूप श्री प्रद्युम्न ने एक ताड़ पत्र पर अपना सन्देश लँकापति विभीषण के लिए लिखा -
🎃 " राक्षस राज विभीषण ! तुम भोजराज उग्रसेन के लिए भेंट दो , यदि बलाभिमानवश तुम मेरी बात नही सुनोगे , तो मैं धनुष से छोड़े गये #बाणों द्वारा #समुद्र पर #सेतु बांधकर ,सैन्यसमूह के साथ लंका पर चढ़ाई करूंगा ""-
-फिर परम पराक्रमी प्रद्युम्न ने उस पत्र को अपने बाण द्वारा लंका भेजा - प्रद्युम्न का #बाण सम्पूर्ण दिशाओ को प्रकाशित करता हुआ #विद्युत के समान #तड़तडाकर विभीषण की राज #सभा मे गिरा --
🍎 चकित होकर विभीषण ने वह पत्र पढा , फिर वहां उपस्थित दैत्य गुरु #शुक्राचार्य ने विभीषण को श्री कृष्ण के परम ब्रम्ह और साक्षात श्री राम जी , ही होने के बारे में बताया - तदन्तर विभीषण भेंट सामिग्री लेकर श्री प्रद्युम्न जी के पास गए और उनकी परिक्रमा करके बड़े भक्ति भाव से सोलह उपचारों द्वारा श्री कृष्ण के पुत्र का पूजन किया --
🎃 फिर परम संतुष्ट हुए प्रद्युम्न जी ने विभीषण को वैराग्य पूर्ण ज्ञान , शांति दायिनी भक्ति ,तथा
प्रेमलक्षणा परानुरक्ति प्रदान की - फिर महाबली विभीषण प्रद्युम्न को प्रणाम कर , भेंट देकर लंका वापस चले गए
फिर प्रद्युम्न ने ऋषभ पर्वत का दर्शन कर ,कांचीपुरी पर विजय पाकर ,दत्तात्रेय और परशुराम जी के दर्शन किये -
🎃 मिथिला में सभी निवासी माला तिलक धारी, श्री कृष्ण नाम के जाप करते हुये , परम धार्मिक थे - मिथिला के राजा धृति से पूजित होकर भेंट लेकर प्रद्युम्न सेना सहित मगध देश प्नहुँचे - अति बलशाली मगध राज #जरासन्ध को प्रद्युम्न ने हराया -- फिर गया , गोमती ,सरयू के तटवर्ती प्रदेशो में गए - काशीराज ने भी हार मानी फिर कौशलराज नगनजीत ने भेंट देकर प्रद्युम्न का पूजन किया -उत्तर दिशा के स्वामी दीपतम , नेपाल के राजा गज ,विशाला नगरी के राजा तथा नैमिषारण्य के राजा ने पूजन करके प्रद्युम्न को भेंट दी --कारूप देश के पौंड्रक ने भी हार स्वीकार की -
🎆 पांचाल और #कान्यकुब्ज ( कन्नौज ) के राजाओ ने भयभीत होकर अपने दुर्गों के दरवाजे बंद कर लिए -फिर प्रद्युम्न मथुरा की परिक्रमा करके वृंदावन गए और नन्द यशोदा आदि सभी को प्रणाम करके उन्हें बहुमूल्य वस्तुएं भेंट में दी -कुछ दिनों तक सभी वृंदावन में रुके -
🎆 फिर हस्तिनापुर पंहुचकर श्री प्रद्युम्न ने राजा धृतराष्ट्र के पास उद्धव को दूत बनाकर उनसे सन्देश भेजा -
🎈परन्तु सभी #कौरवों ने क्रोधित होकर #युद्ध करना निश्चित किया -
🎆🎃 इंद्रप्रस्थ से पांडवों ने भी कौरवों की सहायतार्थ 2 अक्षोणी सेना भेजी - युद्ध मे प्रद्युम्न से दुर्योधन हार गया - भीषण युद्ध होता जानकर वहां श्री बलराम जी और श्री कृष्ण जी ने प्रगट होकर इस युद्ध को रोका और कौरवों यादवों में मैत्री करायी -
इसके बाद अर्जुन भी सेना लेकर प्रद्युम्न के साथ हो लिए--
************* अपनी बात *********** व्याख्या -----****
🎈१-- वाह रे पांडवों की #राजनैतिक #समझ ! -- अत्यंत आश्चर्यजनक घटना -- जिन कौरवों से निरन्तर प्रताड़ित होने के बाद जिन भगवान कृष्ण के ही कारण इन्द्रप्रष्ठ ( दिल्ली ) बसा व युधिष्ठिर वहां के राजा बने -- उन्ही श्री कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न और द्वारिका की सेना से युद्ध करने के लिए युधिष्ठिर ने कौरवों को भाई मानकर उनके समर्थन में अपनी सेना भेजी !!
🎈२-- त्रेता युग मे भगवान श्री राम पत्थरों का सेतु बनाकर लंका पँहुचे थे परंतु द्वापर में प्रद्युम्न बाणों से ही समुद्र पर सेतु बनाने को तैयार थे । यह तत्कालीन विज्ञान के अति उन्नत होने को दर्शाता है ।
🎈३-- श्री प्रद्युम्न के बाण का उनके पत्र सहित समुद्र को पार करके -- " सम्पूर्ण दिशाओ को प्रकाशित करते हुये #विद्युत के समान #तड़तडाकर विभीषण की #सभा मे गिरना -- आज के शब्दों में यह बाण , निश्चित रूप से अग्नि #मिसाइल ही होना चाहिए ।
🎈 ४-- द्वापर युग के अंत तक लंका में विभीषण का राज्य मौजूद था तथा अत्यंत शक्तिशाली वानरों ( द्विविद ) और राक्षसों का अस्तित्व भी उस समय तक था ।
**********क्रमशः ************* राम नाथ गुप्त **************

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