श्री गर्ग संहिता 237


 पोस्ट -( 237 )- श्री गर्ग संहिता ~ परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण चन्द्र की विजय गाथा- ( ३७ ) - वह कौन से पुण्य उग्रसेन ने अपने पूर्व जन्म में किये थे जिसके कारण इस भूतल पर यदुवंशियों के राजा उग्रसेन हुए और उनके भगवान श्री कृष्ण स्वयँ सहायक हुए - तथा --

    राजा उग्रसेन द्वारा राजसूय यज्ञ करने का निषय व प्रद्युम्न के नेतृत्व में यादव सेना की विश्व विजय 

-श्री गर्ग संहिता - विश्वजित खण्ड - अध्याय १ -- श्लोक १/२ -से अध्याय ११तक 

         नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय साक्षिणे । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च ।।

        अग्यानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनश्लाकया । चक्षुरुम्मीलितम् येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।

      🍎 सबके ह्रदय में वास करने वाले सर्वताक्षी वासुदेव ,संकर्षण ,प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध -- चतुरव्यूह स्वरूप भगवान को नमस्कार है ॥ मैं अज्ञान रूपी रतौंधी के रोग से अंधा हो रहा था , जिन्होंने ज्ञानञ्जन की शलाका से मेरी दिव्य दृष्टि खोल दी है , उन गुरुदेव को नमस्कार है ।।

      🍓 श्री गर्गाचार्य जी बोले कि भगवान श्री कृष्ण ने ( राजा मरुत्त के अवतार ) उग्रसेन को द्वारिका का राजा बनाया ,यह सुनकर मिथिलानरेश बहुलाश्व को बहुत आश्चर्य हुआ -उन्होंने श्री नारद जी से पूछा कि वह कौन से पुण्य उग्रसेन ने अपने पूर्व जन्म में किये थे जिसके कारण इस भूतल पर यदुवंशियों के राजा उग्रसेन हुए और उनके भगवान श्री कृष्ण स्वयँ सहायक हुए -


      🎃 श्री नारद जी बोले --उग्रसेन ने पूर्व जन्म में सतयुग में जब वे चक्रवर्ती सम्राट #मरुत्त थे तब विधिपूर्वक हिमालय के उत्तर भाग में " #विश्वजित- #यज्ञ" का अनुष्ठान किया था --मरुत्त ने महामुनीं सम्वर्त को आचार्य बनाकर विशाल हवन कुंडो का निर्माण करा करके विशाल सामिग्रियो से महायज्ञ सम्पन्न किया था -

      भगवान शंकर जी की कृपा से प्राप्त अथाह स्वर्ण भंडार से , यज्ञ में प्रयुक्त सभी बर्तन सोने के बनवाये गए थे , त्रिलोकी में उस समय कोई ऐसा जीव नही बचा था जो भूखा रहा हो , सोमरस पीते पीते देवताओ को अजीर्ण हो गया था -इसी यज्ञ से बचे हुए स्वर्ण पात्रों और विशाल धन जो पर्वत कन्दरा में रक्खा था ,उसको लाकर #पांडवो ने अपना विशाल #अश्वमेध यज्ञ किया था -

          यह यज्ञ न "भूतों न भविष्यति " था - इस यज्ञ में प्रसन्न होकर परिपूर्णतम भगवान श्री कृष्ण ने प्रकट होकर राजा मरुत्त को दर्शन दिए थे और वर मांगने को कहा था --तब मरुत्त ने वर मांगा --


      🎃 "" प्रभो ! इस भूतल पर #बैकुंठलोक स्थापित कर दीजिए , और उसी पुर में श्रेष्ठ भक्तजनो के साथ मैं निवास करूं और आप मेरी #रक्षा करते रहें "--

      🎈वे ही राजा मरुत्त - उग्रसेन हुए और #बैकुंठ के ही भाग से #द्वारिका का निर्माण हुआ था - इसीलिए प्रभु श्री कृष्ण ने #उग्रसेन को #राजा बनाया और आप द्वारिकाधीश बनकर उनकी निरंतर रक्षा करते रहे - और प्रभु ने स्वयम उग्रसेन से राजसूय यज्ञ कराया -

     एक बार राजसभा में इंद्र के दिये हुए स्वर्णिम सिंहासन पर बैठकर राजा उग्रसेन ने श्री कृष्ण से #राजसूय यज्ञ करने की इच्छा व्यक्त की तब प्रभू ने प्रसन्न होकर सहमति दी और फिर राजा उग्रसेन ने सभी को राजसभा में बुलाया और पान का बीड़ा रखकर कहा कि जो विश्व के सभी राजाओ को जीत सके वह यह बीड़ा उठाये -यह सुनकर श्री कृष्ण - रुक्मणी पुत्र " #प्रद्युम्न "ने उस बीड़ा को उठाकर #विश्व #विजय करने की जिम्मेदारी ली -


      🎈फिर भगवान श्री कृष्ण ,राजा उग्रसेन ,बलराम जी और गुरु गर्गाचार्य जी को प्रणाम करके वीर प्रद्युम्न के नेतृत्व में विशाल यादव सेना दिग्विजय के लिए निकली -- 

        🌋 कच्छ के राजा शुभ ने , भेंट देकर सभी का स्वागत किया --कलिंगराज ने तथा मरुंधव देश के राजा गय ने युद्ध में हारकर प्रद्युम्न की अधीनता स्वीकार की -मालव नरेश और महिष्मती पुरी के राजाओ ने युद्ध न करके भेंटें प्रदान की - गुजरात नरेश "ऋष्य" पर विजय पाकर जब प्रद्युम्न चेदि देश के राज्य में प्नहुँचे तब वहां के राजा दमघोष के मना करने के बाबजूद उनके पुत्र शिशुपाल अपने मित्रों और सेना के साथ युद्ध करने आया --युद्ध मे शिशुपाल को हराकर प्रद्युम्न ने बांध लिया तब शिशुपाल के पिता राजा दमघोष जो वसुदेव के बहनोई थे , उनके अनुरोध पर भेंट स्वीकार कर , कृपापूर्वक , शिशुपाल को प्रद्युम्न ने जीवित छोड़ दिया -

       🎈 फिर यादव सेना ने कोंकड ,कटक , त्रिगर्त , केरल ,तैलंग ,महाराष्ट्र ,कर्नाटक आदि देशों पर विजय पायी फिर महारन्गपुरम में जहां श्री वसुदेव की बहन भूतदेवा के पति "वृद्धशर्मा राजा थे , उन्होंने यादव सेना का स्वागत करना चाहा परंतु शिशुपाल की तरह ही , उनके पुत्र " दन्तवक्र "जो राक्षसो से मैत्री रखता था ने भयँकर युद्ध किया मगर बुरी तरह घायल हुआ तब राजा वृद्धसेन और रानी भूतिदेवा ने आकर प्रद्युम्न की स्तुति करके भेंट दी- कुरूप देश ,उशीनगर पर विजय प्राप्त करके प्रद्युम्न सेना सहित मुनिवर अगस्तय के आश्रम पर प्नहुँचे और उनसे उपदेश व आशीर्वाद प्राप्त किया - फिर #लंका के राजा #विभीषण के पास #सन्देश भेजने के बारे में विचार किया ---

**** क्रमशः *********** राम नाथ गुप्त **********

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