श्री गर्ग संहिता 236


 पोस्ट -( 236 )-- श्री गर्ग संहिता ~परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान की विजय गाथा - ( ३६ ) -

🎈 श्री कृष्ण के सखा श्री सुदामा ब्राह्मण की कथा --- 

    🎃 क्या सुदामा जी #दीन थे ? ---- #बिल्कुल #नही -- मगर क्यों और कैसे ?

- श्री गर्ग संहिता - द्वारिका खण्ड - अध्याय 22 - श्री कृष्ण के सखा श्री सुदामा ब्राह्मण की कथा -- 

       देखि सुदामा की दीन दशा , करुणा करि के करुणा निधि रोये ।

        पानी परात को हाथ छुओ नहिं , नयन्ह के जल सो पग धोए ।।


     🎈 क्या सुदामा दीन थे ? जी बिल्कुल नही - वेद वेदांगों के महान विद्वान , जिन्हें श्री कृष्ण के साथ ही उन्हें भी ,उनके गुरु महर्षि संदीपन जी ने दुर्लभ वर दिया था -

   🎃 " मेरे बच्चों ! तुम लोग मेरी आज्ञा का पूरी तरह पालन कर रहे हो ,इसलिए मैं सन्तुष्ट होकर तुम्हे दुर्लभ वर दे रहा हूँ -तुम लोगों की #सब #अभिलाषाएं #पूर्ण हों, वेद और पुराणादि शास्त्र तुम्हारे कंठस्थ हो जाये "" ( गर्ग संहिता - द्वारका खण्ड -अध्याय 22 श्लोक 40 / 41 )


      🍎 सच यह है कि परम विद्वान श्री सुदामा जी अपनी पत्नी सुशीला के साथ #अयाचित #वृत्ति ( किसी से कुछ भी न मांगने वाली ) के द्वारा ब्राह्मण धर्म का पालन करते हुए तप करते हुए विद्या दान भी करते थे , इसलिए प्रखर #विद्वान होते हुए भी वे #धनहीन थे - जब उन्होंने अपनी पत्नी को श्री कृष्ण के सखा होने के बारे में बताया तब फ़टे पुराने कपड़ो में अब तक संतुष्ट रहने वाली पत्नी ने जब उनसे अपने सखा प्रभु के पास जाकर धन मांगने को कहा तब वे बोले 

     🎃-" मैं सब को सिखाता हूँ , आज तुम मुझे सीखा रही हो ! तुम एक विद्वान ब्राह्मण को मांग कर धन प्राप्ति करने का उपदेश दे रही हो ?( श्लोक 8 ) 

        फिर पत्नी के ज्यादा कहने पर जब वे अपने मित्र श्री द्वारिकाधीश के पास मिलने गए तब भी उन्होंने कुछ नही मांगा - 

      🎈 कर्मो का फल तो सभी को भोगना ही पड़ता है , गुरु के यहां विद्यार्थी जीवन मे गुरुमाता के दिये चनों को अकेले ख़ाने के लोभ में श्री कृष्ण से #झूठ #बोलने के परिणाम और इससे मिला #गरीबी का इतना भयँकर #दुखदायी परिणाम सुदामा जी ने भोगा -- 

       🍎 प्रभु ने सुदामा को इस दुख से उबारने के लिए श्री सुदामा जी से छीनकर फ़टे कपड़े में बंधे चिउडी ( चावल ) का भोग लगाया - दो मुट्ठी चिवडा खाने के बाद तीसरी मुट्ठी चिवड़ा जैसे ही ख़ाना चाहा , श्री रुक्मणी जी ने प्रभु का हाथ पकड़ लिया और बोली " अब दो लोको की सम्पत्ती तो दे दी , अपना गोलोक तो मत दो -"" इतने दयालु हमारे प्रभु गोपाल श्री कन्हया लाल जी -

       🎃 भक्तवत्सल प्रभु जिनके चरणों की सेवा करने को सुर मुनि भी तरसते है ,उन्होंने अपने सखा और परम भक्त श्री सुदामा जी के चरणों को अपने प्रेमाश्रुओ से धोया और फिर महर्षि श्री बाल्मीक जी के वचनों का पालन करने के लिए --( श्री राम चरित मानस - अयोध्या कांड दोहा 131 )-


          🎈 "" जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु , तुम्ह सन सहज सनेहु ।

                     बसहु निरंतर तासु मन , सो राउर निज गेहु ।।

        परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान ने अयाचित वृत्ति वाले , जिसने प्रभु से भी कुछ नही मांगा - उस परम धार्मिक , वेदाज्ञाओ का पालन करने वाले श्री सुदामा जी के मन ( #ह्रदय ) में अपना #निवास स्थान बना लिया -

       🎆 सुदामा नगर , द्वारिका पुरी के समान हो गया -- -- वापस आने पर सुदामा जी ने अपने गाँव के स्थान पर , द्वारिका के समान महलो , भवनों , और सुंदर साड़ी , गहनों से सजी अपनी ब्राम्हणी सुशीला को पाया -- 


      🎃🎆 यह तो अब #स्वाभाविक था - अब प्रभु का निवास सुदामा के ह्रदय में था और जहां प्रभु का निवास है , वही तो #महालक्ष्मी का भी #निवास है-- #द्वारिका है - #महाठगनी #महामाया तो प्रभु की #चेरी है , उसने छण भर में सुदामापुरी को द्वारिका के समान वैभवशाली पुरी में बदल दिया -

          दयालु भक्तवत्सल परम प्रभु श्री कृष्ण भगवान की जय हो !

**** क्रमशः **************** राम नाथ गुप्त ***********

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