श्री गर्ग संहिता 230


 पोस्ट --( 230 )-- श्री गर्ग संहिता ~ परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान की विजय गाथा ( ३० ) -- 

कालयवन का भस्म होना - #अवश्य #पढ़ें - 🎆 जरासंध द्वारा प्रवर्षण पर्वत पर आग लगाकर श्री कृष्ण और बलराम को मारने का प्रयास -- दोनो का आकाश मार्ग से द्वारिका गमन -- 

🎆 यह कथा हम आप सभी के #जीवन की #कथा है -- 🎆 श्री गर्ग संहिता - द्वारका खण्ड -


     🍅 #कालयवन ने विशाल सेना के साथ मथुरा के चारो ओर घेरा डाल दिया तब श्री कृष्ण भगवान , श्री बलराम जी की अनुमति लेकर नगर के बाहर बिना अस्त्र सस्त्र के पैदल निकल कर कालयवन के सामने से भागने लगे - दुष्ट कालयवन भी श्री कृष्ण को पकड़ने के लिए पैदल ही उनके पीछे भागा - श्री हरि भागते हुए श्यामलाचल पर्वत की एक कन्दरा में घुस गए - उस कन्दरा में सतयुग से #मांधाता के बड़े पुत्र मुचकुंद शयन कर रहे थे - देवासुर संग्राम में राजा मुचुकुन्द की सहायता के कारण देवताओ ने दानवो पर विजय पाई थी - तब युद्ध मे निरन्तर जागने के कारण अत्यंत थके हुए मुचुकुन्द ने देवराज इंद्र से कहा था -


     🎃" मैं अच्छी तरह सोना चाहता हूँ , सोकर उठने पर मुझे साक्षात श्री हरि के दर्शन हों , अगर कोई दूसरा व्यक्ति बीच मे मुझे जगा दे ,वह मेरी दृष्टि पड़ते ही तत्काल भस्म हो जाये ""


      🍎 भगवान ने गुफा में जाकर सोये हुये राजा मुचुकुन्द को अपना #पीताम्बर उढ़ा दिया और छिपकर खड़े हो गए - कालयवन भी पीछा करते हुए उस गुफा में आया और क्रोध में भरे हुए उस महादुष्ट ने पीताम्बर ओढ़े कर सोए हुए मुचुकुन्द को श्री कृष्ण समझ कर उन पर जोरों से लात का प्रहार किया --मुचुकुन्द सहसा उठ बैठे और उन्हों ने आंखे खोलकर चारो ओर दृष्टिपात किया --कालयवन उन्हें पास ही खड़ा दिखाई दिया और रोष से भरे हुए मुचुकुन्द की दृष्टि पड़ते ही कालयवन अपने ही देह से उत्पन्न आग की ज्वाला से उसी छण #जलकर #भस्म हो गया-- फिर प्रभु श्री कृष्ण ने राजा मुचुकुन्द को दर्शन दिए और उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर उन्हें बद्रिकाश्रम में जाकर तपस्या करने तथा अगले जन्म में ब्राह्मण देह पाकर फिर भक्ति योग करके प्रभु के दिव्य धाम को प्राप्त कर लेने की बात कही - 

     🍅 इस प्रकार श्री हरि की आज्ञा पाकर पुनः स्तुति व परिक्रमा करके श्री कृष्ण के प्रेम से विव्हल होकर जब मुचुकुन्द उस गिरिगुफ़ा से बाहर निकले तब , द्वापर में छोटी आकृति के मनुष्य , सतयुग के #कई #ताड़ऊंचे मुचुकुन्द को देखकर मार्ग में भयभीत होकर इधर उधर भागने लगे --

      🎈इस तरह उन बुद्धिमान मुचुकुन्द को वरदान देकर भगवान पुनः मलेच्छो से घिरी हुई मथुरापुरी में आये , और सारी मलेच्छ सेना का संहार करके उनका धन आयुध आदि सब छीन लिए - 


      🍎 मगध नरेश जरासन्ध ने अपने नगर के ब्राह्मणों को बुलाकर मथुरा पर चढ़ाई करने का मुहूर्त निकलवाया तथा उसने मुहूर्त निकालने वाले ब्राह्मणों को कैद में डालते हुए कहा कि अगर वह जीत कर आता है तब ब्राह्मणों के आधीन रहकर उनकी पूजा करेगा और अगर हार जाता है तो उन्हें मार डालेगा - 

        🎆और फिर बहुत बड़ी सेना लेकर उसने मथुरा पर आक्रमण कर दिया - अन्तर्यामी प्रभु ने ब्राह्मणों के जीवन पर खतरा जानकर अपनी " #टेक " छोड़ दी और मनुष्य सी चेष्टा अपनाकर अपने नगर से भयभीत की भांति बलदेव जी के साथ श्री कृष्ण पैदल ही बड़े जोर से #भागे -

       🍅 अट्टहास करते हुए जरासन्ध ने रथ सेना के साथ उन दोनों का पीछा किया - श्री हरि #दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए #प्रवर्षण पर्वत पर चढ़ गए -उन दोनों को उस पर्वत पर छिपा जानकर जरासन्ध ने पर्वत पर लकड़ियां जलाकर वहां के जंगल मे आग लगा दी - तब दोनो भाई बलराम जी व श्री कृष्ण उस प्रवर्षण पर्वत के 11 योजन ऊंचे शिखर से कूदकर शत्रुओं से अलक्छित रहकर द्वारका में जा पहुँचे - पर्वत के साथ ही श्री कृष्ण और बलराम को दग्ध हुआ जानकर जरासन्ध विजय का उद्घोष करता हुआ वापस चला गया -

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       *****आध्यात्मिक व्याख्या --- अपनी बात ****

      🎆 जरासन्ध === जरा माने बुढापा + संध माने जोड़ === यानी बुढापे में जोड़ो का दर्द तथा बुढापे के रोग


      🎆 सीनियर सिटीजन होने पर बुढापे में-- जरासन्ध ( जोड़ो के दर्द तथा अन्य बीमारियों के द्वारा ) मथुरा ( हमारे शरीर ) पर आक्रमण करता है -- हम औषधियों , योग व अन्य साधनों से जरासन्ध के हमले ( रोगों ) को बार बार नाकाम कर देते है परंतु अठारहवी बार ( Last में ) जब जरासन्ध कालयवन ( काल माने मृत्यु )को साथ लेकर आक्रमण करता है तब मनुष्य को #मथुरा ( अपना शरीर ) को छोड़ना ही पड़ता है -,और #दक्षिण दिशा ( यमराज की दिशा ) में जाकर वहां स्थित प्रवर्षण पर्वत पर चढ़ना ही पड़ता है ।

   फिर #अंतिमशैया जलते हुए " प्रवर्षण पर्वत " ( #चिता ) पर पंहुचकर शरीर का #अग्निदाह होता ही है ।


       🍎 श्री #हरिनाम का #पीताम्बर ही मृत्यु के महान कष्टों से से रक्षा करता है इस पीताम्बर को ओढ़े हुए व्यक्ति ( मुचुकुन्द ) का कालयवन कुछ नही बिगाड़ पाता है वरन उसकी दृष्टि पड़ते ही भस्म होकर वह अपना अस्तित्व भी खो देता है ।

      🍅 बचता वही है जो श्री कृष्ण और राम नाम के बल ( #बलराम ) का आश्रय लेता है वह प्रवर्षण पर्वत ( #चिता ) पर से अनायास ही प्रभु की द्वारिका नगरी ( #गोलोक #धाम ) पहुँच जाता है --

   ****** क्रमशः**** राम नाथ गुप्त कनौज ********

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