पोस्ट --( 229 )-- श्री गर्ग संहिता ~ परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान की विजय गाथा -( २९ ) -
श्री बलराम जी द्वारा कोल दैत्य का वध- जरासंध का मथुरा पर 17 बार आक्रमण -- कालयवन का आक्रमण और श्री कृष्ण द्वारा द्वारिका पुरी का निर्माण -- -- श्री गर्ग संहिता - मथुरा खण्ड और द्वारका खण्ड -
कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च । नन्दगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ।।
🍟जो वसुदेव के पुत्र , देवकी नन्दन होने के साथ ही नन्द गोप के कुमार भी है , उन सच्चिदानन्द स्वरूप गोविंद को बारम्बार नमस्कार है ।
🎃 साक्षात भगवान श्री कृष्ण ने बृज में कई दिनों तक रहकर ,सबको अपना दर्शन देकर मथुरा जाने के लिए वे तैयार हुए तब अपलक नेत्रों से श्री धर के मुख की ओर देखते हुए समस्त ब्रजवासी गोपो ने स्नेहविवहल होकर उनसे जल्द वायस आने की प्रार्थना की - श्री कृष्ण ब्रजवासियो से बोले -
🍎 " तुम सब मेरे प्राण हो , परम प्रिय हो , मेरा हृदय तुम लोगों में स्थित है , केवल शरीर अन्यत्र दिखाई देता है , मैं प्रतिमास तुम लोगों को दर्शन देने अवश्य आऊंगा ""
फिर उन गोपो आदि को आश्वासन देकर प्रभु ने यशोदा सहित नन्दराज को दूसरे रथ पर बिठाया और श्री दामा आदि सखाओ को साथ लेकर , उद्धव सहित रथ पर आरूढ़ होकर मथुरा को प्रस्थान किया
🍘 कंस के मित्र "कोल" नामक दैत्य से पीड़ित होकर बहुत से लोग दीन चित्त होकर ब्राह्मणों के साथ मथुरा श्री बलराम जी की शरण मे आये - उन्होंने बताया कि ~
"महाबली मायावी दैत्य कोल ने कौशांबी पुरी के राजा कौशरवि को पराजित करके अब वह वहां राज्य कर रहा है , वह बहुत अत्याचार कर रहा है , जब तक कंस का मित्र कोल दैत्य जीवित है कंस को मारा हुआ नही समझना चाहिए "
🎈श्री बलराम जी गंगा यमुना के बीच बसी हुई कौशाम्बी नगरी गए और मायावी दैत्य को भीषण युद्ध मे मारकर ,उन्होंने वहां के पुराने राजा कौशरवि को पुनः वहां का शाशक बना दिया - फिर श्री बलराम जी ने कौशाम्बी से 4 योजन दूर , गंगा में जाकर जिस स्थान पर स्नान किया ,वह " राम तीर्थ "कहलाया - श्री बलराम जी ने गंगा जी के अन्य तटवर्ती तीर्थो में भी जाकर स्नान और दान किया -
🍎 राजा बहुलाश्व के पूछने पर श्री नारद जी ने आगे की कथा सुनाते हुए कहा -- महाबली कंस के मारे जाने पर ,उसकी दोनो पत्नियां -- अस्ति और प्राप्ति - बड़े दुख के साथ अपने पिता महाबली राजा जरासंध के पास गयी , श्री कृष्ण द्वारा कंस के मारे जाने का समाचार सुनकर जरासंध ने अत्यंत कुपित होकर इस भूतल को यदुवंशियों से शून्य कर देने के उद्देश्य से बहुत विशाल सेना के साथ मथुरापुरी पर आक्रमण कर दिया - जरासंध को निमित्त बनाकर पृथ्वी पर के दुष्ट और पापी राजाओ को नष्ट करने और साधु पुरुषों का प्रिय करने के उद्देश्य से प्रभु श्री कृष्ण ,बलराम जी के साथ दो रथों पर सवार होकर मथुरा नगर के बाहर निकले -
🎆 जरासंध के साथ ही धृतराष्ट्र पुत्र #दुर्योधन , विन्ध्य देश और बंग देशों के राजा भी सेनाओ के साथ , प्रभु से युद्ध करने लगे -श्री कृष्ण ने अपने शारंगधनुष से विरोधियों की सारी सेनाओं का नाश कर दिया - इस प्रकार जरासंध की सेनाओं का सभी ओर से संहार हो जाने पर , दुर्योधन ,विन्धराज और बंग नरेश सब भयभीत होकर रण भूमि से भाग गए - जरासंध को बलराम जी ने परास्त करके उसका वध करना चाहा तभी श्री कृष्ण ने उन्हें रोक दिया और जरासंध को रिहा करवा दिया - अपमानित हारा हुआ जरासंध वापस अपने नगर चला गया
युद्ध मे जो कुछ धन वित्त हाथ लगा वह सब लेकर श्री कृष्ण और बलराम ने सूतो ,माग़धो , और वंदीजनो से विजय गान सुनते हुए ,शंख ध्वनि ,दुन्दुभी नाद और वेद मंत्रों के भारी घोष के साथ मथुरा नगर में प्रवेश किया ।
जरासंध ने फिर दुबारा उतनी ही सेनाओं के साथ मथुरा पर आक्रमण किया परंतु श्री कृष्ण ने उसे फिर पराजित कर दिया -
🎆 श्री कृष्ण के प्रभाव से समस्त यादव अभ्युदय को प्राप्त हुए ,उन्हें अस्त्रो के बल से सदा #आक्रमणकारी शत्रुओं को लूटने का #साहस हो गया , 🎈तब बालक और पनिहारिने भी बिना युद्ध के ही शत्रुओं की सम्पत्ति का हरण करने लगी --
🎆इस प्रकार सत्रह बार अपनी सेना का संहार कराकर जरासंध परास्त हुआ -तदनन्तर अट्ठारहरवी बार उसके साथ महाबली #कालयवन ने भी बहुत विशाल मलेच्छो की सेना के साथ मथुरा पर डेरा डाल दिया -मलेच्छो की सेना देखकर , अपने नगर को भय विवहल जानकर ,दोनो ओर से आने वाले भय पर विचार करके श्री कृष्ण , बलराम जी के साथ चिंतित हो गए -
🎆अपने सजातीय बन्धुओ की रक्षा के लिए ,माधव ने भयँकर गर्जना करने वाले समुद्र के भीतर ,एक ही रात में द्वारका दुर्ग का निर्माण कराया --वहां विश्वकर्मा ने आठो दिग्पालों की सिद्धियां निर्मित की ,तथा वहां बैकुंठ की सारी सम्पत्ति का दर्शन होता था -तदन्तर श्री हरि ने योग शक्ति से समस्त आत्मीय जनों को द्वारका दुर्ग में पंहुचा कर वे बलराम जी की आज्ञा लेकर मथुरा नगर से बिना अस्त्र सस्त्र के ही बाहर निकले -- ******* क्रमशः******* राम नाथ गुप्त कन्नौज *****

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