श्री गर्ग संहिता 226


 पोस्ट --( 226 )- श्री गर्ग संहिता ~ परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान की विजय गाथा -( २६ ) -

 रावण और कंस - पूर्व निश्चित मृत्यु के सम्बंध में दोनो के कार्यो की तुलनात्मक विवेचना -- धोबी दर्जी और माली के पूर्वजन्म का विवरण - गुरु पुत्र को यमराज के यहां से पास लाना -- - गर्ग संहिता --मथुरा खण्ड 

  🎃 रावण और कंस - पूर्व निश्चित मृत्यु के सम्बंध में जानने वाले , दोनो के कार्यो की तुलनात्मक विवेचना -

         🍎असुर रावण भी अत्यंत शक्तिशाली और विचित्र मायावी शक्तियों का स्वामी था - रावण को इस बारे में पता था कि उसकी मृत्यु कैसे होगी ,परंतु रावण यमराज को पहले ही जीत चुका था , इसलिए बल और शक्तियों के अभिमान में उसने श्री ब्रम्हा जी के वचनों पर भी विश्वास न कर उनकी हंसी भी उड़ाई थी - श्री शंकरजी को प्रसन्न करने के लिए रावण ने हवन कुंड में अपने शीशों की बलि दी थी -

          जरत बिलोकेउँ जबहि कपाला । बिधि के लिखे अंक निज भाला ।।

           नर के कर आपन वध बाँची । हँसेउ जानी बिधि गिरा असांची ।।

           सौउ मन समुझि त्रास नहि मोरे । लिखा बिरंचि जरठ मति भोंरे ।।

                    ( श्री राम चरित मानस लंका कांड 28 / 29 )

      🍎 कितनी मूर्खतापूर्ण सोच , कि ब्रम्हा जी ने उसकी मृत्यु मनुष्य के हांथो होना अपनी वृद्धावस्था के कारण भूलवश गलत लिख दी है -- और असीम बल के अभिमान में रावण ने इस चेतावनी की उपेक्षा करके पापो और अत्याचारों को करना निरंतर जारी रक्खा --

        असुर कालकेतु जो कंस हुआ , उस कंस को भी आकाशवाणी द्वारा देवकी के आठवें पुत्र से मृत्यु होने का पता चल गया था -

      🎃 जहां रावण ने मृत्यु की चेतावनी की उपेक्षा की ;, वही कंस ने मृत्यु से बचने के लिए --पाप कर्मों को छोड़कर परोपकारी कर्मो को करने की बजाय -अपनेअसुर मित्रो द्वारा नवजात बालको की हत्या करवाने तथा कृष्ण की हत्या करने का महान पापमय रास्ता चुना और मृत्यु को जीत लेना चाहा - कया मृत्यु को जीतना किसी के लिए सम्भव हो सकता है ? - नतीजा जितनी तेजी से पाप का घड़ा भरा , उतनी ही मृत्यु नजदीक और अत्यंत कष्टमय हुई ।

       🌰 कंस और उसके भाइयो को मारने के बाद श्री कृष्ण और बलराम जी मित्रो और साथियों के साथ कारागार में अपने पिता और माता के पास गए और उन्हें बन्धनों से मुक्त कराया - श्री कृष्ण जी के अमानवीय भगवत्ता से परिपूर्ण कार्यो को देखकर वसुदेव और देवकी जी को ज्ञान सम्पन्न हुआ देखकर, श्री कृष्ण ने अपनी #माया फैला दी - वे माया ग्रस्त होकर पुनः श्री हरि को पुत्र मान करके उसी अनुरूप व्योहार करने लगे - फिर कंस के पिता उग्रसेन को बन्दी ग्रह से छुड़ाकर प्रभु ने उन्हें मथुरा का शाशक बनाया ।

      🍓 फिर वसुदेव ने अपने पुरोहित महर्षि गर्गाचार्य जी को बुलाकर विधिवत अपने दोनों पुत्रों श्री कृष्ण और बलराम जी का #उपनयन #संस्कार करवाकर उन्हें पढ़ने के लिए गुरु महर्षि #संदीपन के आश्रम पर भेजा - जैसे श्री राम जी ने --

      " गुरु गृह गए पढ़न रघुराई । अल्प काल विद्या सब पाई " उसी प्रकार श्री बलराम जी व श्री कृष्ण ने भी बहुत ही थोड़े समय में गुरु से सभी विद्याएं प्राप्त कर ली -- 

        🎃 गुरु दक्षिणा की बाबत पूछने पर गुरु संदीपन ने श्री कृष्ण से काफी समय पूर्व समुद्र में डूब कर #मरे अपने #पुत्र को वापस ला देने को कहा -- तब दोनो भाई , रथ पर चढ़कर , मन और इन्द्रिय को वश में रखते हुए प्रभास तीर्थ में समुद्र के निकट गए ---श्री रामावतार के समय प्रभु का प्रताप देख चुके समुद्र ने घबड़ाकर तुरन्त प्रभु का स्वागत हीरे मोतियों को भेंट करके किया - श्री कृष्ण ने समुद्र से उसके द्वारा अपह्रत किये गए गुरु जी के पुत्र को वापस ला कर देने की आज्ञा दी -

         🎃 समुद्र ने नम्रतापूर्वक बताया कि गुरु पुत्र का अपहरण उसने नही वरन उसके अंदर रहने वाले शंख रूपधारी पांचजन्य दैत्य ने किया है - प्रभु ने समुद्र के अंदर जाकर उस दैत्य को मार कर उसे भी मुक्ति प्रदान की और उसके शरीर से उत्पन्न शंख पांचजन्य को लेकर बाहर आये - फिर दोनों भाई अपने दिव्य रथ पर बैठकर #यमराज की विशाल " #संयमनी " पूरी पहुँचे और अपने पांचजन्य शंख से भयंकर ध्वनि की -- यमराज ने तुरंत ही गुरु पुत्र को लाकर प्रभु को सौंप दिया --फिर दोनों भाई अवन्तिकापुर गुरु संदीपनी के पास गए और उन्हें उनके पुत्र को जीवित अवस्था मे सौंप दिया -

        🍎 वापस मथुरा आने पर सभी नगर वासियो ने दोंनों भाइयो का स्वागत व अभिनन्दन किया -- फिर श्री कृष्ण ने अपनी बुआ के पुत्रों पांडवों के हालचाल जानने के लिए " अक्रूर " को हस्तिनापुर भेजा - अक्रूर ने वापस आकर पांडवो की दयनीय हालत के बारे में प्रभु को बताया तब श्री कृष्ण ने वहां जाकर ,कौरवों से बलपूर्वक आधे राज्य का बंटवारा करवाया और #पांडवो की नयी राजधानी #इंद्रप्रस्थ का निर्माण करवाया --

     फिर अपने किये हुए वायदे के अनुसार श्री कृष्ण कुब्जा के यहां गए और उसका स्वागत सत्कार स्वीकार किया --

 श्री कृष्ण द्वारा मुक्त किये गए धोबी ( रजक ,), दर्जी , माली के पूर्व जन्म का परिचय --

           🎃 रामावतार के समय जिस धोबी ने श्री सीता जी पर झूठे लांछन लगाये थे जिसके कारण सीता जी को श्री राम ने त्यागा था , वही धोबी कंस के कपड़े लेकर जाने वाला था - उसे श्री कृष्ण रूप में प्रभु ने सजा में मृत्यु देकर मुक्ति प्रदान की ---  

             🎃 श्री जनक जी के यहां जिस दर्जी ने श्री सीता जी व राम जी के कपड़े सिले थे , वह ही श्री कृष्ण आदि के पकड़े ठीक करने वाला दर्जी था और  

             🎃 कुबेर का माली जो परम् हरि भक्त था वह ही माली रूप में आया था ,प्रभु ने उन दोनो के यहां जाकर उन्हें परम् सौभाग्य प्रदान किया ---

       ************* क्रमशः ***************रामनाथ जप्त ******

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