श्री गर्ग संहिता 224


 पोस्ट्स --( 224 ) -- श्री गर्ग संहिता ~ परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान की विजय गाथा -- सैरन्ध्री कुब्जा की कथा की आध्यात्मिक व्याख्या -- भगवान विष्णु के वैष्णव धनुष को तोड़ना - कंस के 5000 सैनिकों का वध - कुबलिया पीड हाथी का वध -- श्री गर्ग संहिता --

       सैरन्ध्री कुब्जा की कथा की आध्यात्मिक व्याख्या --

        🍓 तीन जगह से टेढ़े शरीर वाली कुब्जा सैरन्ध्री ने कंस के लिए बनाए हुए सुगंधित लेप को भगवान श्री कृष्ण समर्पित किया और प्रभु ने उसके शरीर को सीधा करके उसे अत्यंत सुंदर लावण्यमय रूप प्रदान किया था - हम सब मानव भी #मन से #तीन जगह से टेढ़े #कुब्जा सरीखे ही है -- #मोह ग्रस्त अभिमान -- #लोभ -- #काम जैसे दुर्गुणों से ग्रसित होकर , इन्हें पाने को लालायित कुछ भी करने को तैयार मानव , सच मे तीन जगहों से टेढ़ा कुब्जा स्वरूप ही है -प्रभु को मन अर्पित करने पर , प्रभु का सानिध्य मिलने पर उनकी कृपा से ही इन विकारों , दुर्गुणों से मुक्ति होना सम्भव होता है और इन दुर्गुणों से मुक्ति होते ही प्रभु की कृपा से #परमानन्द प्राप्त होता है ।

       🍅 कुब्जा को परम सुंदरी बनाने के बाद मथुरा के बाजार में वणिको, धनी व्यापारियों आदि ने , पान , फूल ,इत्र , दूध और फल आदि द्वारा श्री हरि का पूजन करके उन्हें उत्तम आसन पर बैठा कर स्वागत किया और चरणों मे प्रणाम किया -- फिर श्री कृष्ण ने उन वणिको से धनुष कहाँ रक्खा है जानना चाहा -- उनके बताए रास्ते से होते हुए वे जहां वैष्णव धनुष रक्खा हुआ था वहां पँहुचे --

       🌰 देवासुर संग्राम में भगवान विष्णु ने असुरो को हराकर उन्हें पाताल जाने को विवश किया था फिर अपने दोनों धनुषों को कृपापूर्वक श्री परशुराम जी को दे दिया था -  

       एक धनुष श्री परशुराम जी ने सीता स्वयंवर के समय श्री राम को उनकी परीक्षा लेने हेतु दिया था तथा 

      🎃 दूसरे इस धनुष को राजा ययाति के पुत्र राजा यदु को रखने के लिए दे दिया था - यदु के ही वंश में यह अब कंस के यहां बहुत कड़ी सुरक्षा में रक्खा हुआ था - कंस को वरदान प्राप्त था कि इस धनुष को तोड़ने वाले के हाथों ही उसकी मृत्यु होगी --

      🎇 वह विशाल ,सोने से मढ़ा हुआ धनुष वजन में बहुत ही भारी था , सैकड़ो व्यक्ति मिलकर उसे मुश्किल से एक जगह से दूसरी जगह ले जा पाते थे -- रक्षको के मना करने के बाद भी श्री कृष्ण ने उसे सहसा उठा लिया फिर उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और सबके देखते ही देखते उसे तोड़ डाला - इससे भयँकर शब्द हुआ और फिर कंस के सेवको ने प्रभु व उनके साथियों पर हमला कर दिया - श्री बलराम और श्री कृष्ण ने टूटे हुए धनुष का एक एक हिस्सा उठा लिया और उससे कंस के 5000 सैनिको को मार डाला --उसके बाद वे नन्द आदि के साथ अपने ठहरने के स्थान पर पँहुच गए--

           मथुरा नगर की जिन स्त्रियों ने दिन में नन्द नन्दन श्री कृष्ण के दर्शन किये थे , उन्होंने रात्रि में नींद में भी अपने साथ रास क्रीड़ा करते हुए प्रभु के दर्शन किये --

       🍟 रजक ( कपड़े रंगने वाले ) के मस्तक छेदन और धनुष भंग तथा रक्षको के मारे जाने का समाचार पाकर भयभीत राजा कंस ने अगले दिन , प्रातःकाल ही , सेवको को बुलाया और राज सभा भवन के सामने ही मल्ल युद्ध क्रीड़ा महोत्सव प्रारम्भ करने की आज्ञा दी - 

        वहां सोने के खम्बे लगाकर सुनहरे चन्दोवे टांगे गए - राजा के लिए रत्नमय सुंदर मंच और उस पर दस हाथ ऊंचा सिंहासन स्थापित किया गया जिस पर कंस आरूढ़ हुआ --छोटे छोटे मंडलो के शाशक ,नरेश व नगर और जनपद के निवासी , प्रथक प्रथक मंच पर बैठ कर मल्ल युद्ध देख रहे थे --चारूड , मुष्टिक ,कूट ,शल , और तोषल आदि पहलवान मुगदरों से अभ्यास कर रहे थे - नन्द आदि गोप राजा को भेंट देकर एक ओर अपने स्थान पर बैठ गए --कंस के सम्बन्धी और मित्र जरासंध , बाणासुर , नरकासुर आदि राजाओ के यहां से भी उपहार आये थे ।

      🎃 तदन्तर अपनी माया से बालक रूप धारण किये बलराम और श्री कृष्ण --दोनो भाई भी वहां पहुँचे --कंस की कृष्ण और बलराम को मारने की पूर्व निश्चित योजनानुसार , रंगमंडप के बाहर द्वार पर खड़े किये गए अति बलवान #कुबलियापीड नामक हाथी के महावत ने हाथी को उत्तेजित करके उससे दोनो भाइयो को कुचलने का प्रयास किया - श्री कृष्ण ने हाथी की सूंड और बलराम ने उसकी पूंछ पकड़कर खींची और फिर उठाकर हाथी को पटक दिया जिससे वह मर गया - फिर दोनों भाइयों ने हाथी के एक एक दांत को उखाड़कर अपने अपने हाथों में लेकर , उससे वहां मौजूद अन्य हाथियों और हमला करने आये कंस के सैनिको का वध कर दिया -

       *****क्रमशः-**** राम नाथ गुप्त ********

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