श्री शिव महापुराण पुष्प माला 1968


                                     Shri shiv mahapuran

पोस्ट -( 1968 )- श्री शिव महापुराण -पुष्प माला - 【 १६८ 】 - शिव और शिव की विभूतियां - तथा परमेश्वर शिव के यथार्थ स्वरूप का विवेचन --- वायवीय संहिता - उ० ख०-- अध्याय 34 और 35 ~~~


       🍎 भगवान श्री कृष्ण के पूछने पर महामुनि उपमन्यु बोले -- देवकीनन्दन ! साक्षात महादेवी शिवा शक्ति है और महादेव शिव जी शक्तिमान । उन दोनों की विभूति का लेशमात्र ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत के रूप में स्थित है । यहां कोई वस्तु जड़रूप है और कोई चेतन रूप । यह दोनो क्रमशः शुद्ध और अशुद्ध तथा पर और अपर कहे गए है । अपर और पर चिद चित्स्वरूप है , और इन पर स्वभावतः शिव और शिवा का स्वामित्व है । जिस तरह चंद्रमा और चांदनी में कोई अंतर नहीं है उसी प्रकार शिव और शिवा में कोई अंतर नहीं है । जो इस परा और अपरा विभूति को ठीक ठीक जान लेता है ,,वह अपरा विभूति को लांघकर , परा विभूति का अनुभव करने लगता है ।


       🚫🍎 जिसके द्वारा शिव सदा देहधारियों को भोग और मोक्ष देने में समर्थ होते हैं वह आद्या ,अद्वितीय चिन्मयी परा शक्ति , शिव के ही आश्रित है । ज्ञानी पुरुष उसी शक्ति को सर्वेश्वर परमात्मा शिव के अनुरूप , उन उन अलौकिक गुणों के कारण उनकी सहधर्मिणी कहते हैं । वह एक मात्र चिन्मयी परा शक्ति सृष्टि - धर्मिणी है । वही शिव की इच्छा से विभाग पूर्वक नाना प्रकार के विश्व की रचना करती है । वह शक्ति मूल प्रकृति ; माया ; और त्रिगुणा -- तीन प्रकार की बताई गयी है । उस शक्ति रूपी शिवा ने ही इस जगत का विस्तार किया है ।


        🎃 ज्ञान , क्रिया और इच्छा - अपनी इन तीन शक्तियों द्वारा शक्तिमान ईश्वर सदा सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त करके स्थित होते हैं । इस प्रकार कार्यों का नियमन करने वाली महेश्वर की इच्छा शक्ति नित्य है । उनकी जो ज्ञान शक्ति है वह बुद्धि रूप होकर कार्य ,करण ,कारण और प्रयोजन का ठीक ठीक निश्चय करती है और शिव की जो क्रिया शक्ति है वह संकल्प रूपिणी होकर उनकी इच्छा और निश्चय के अनुसार कार्य रूप सम्पूर्ण जगत की क्षणभर में कल्पना कर देती है । इस स्त्री और पुरुष रूप धारी जगत में शक्तिमान पुरुष रूप शिव तो परमात्मा कहे गए हैं और स्त्री रूप धारिणी शिवा उनकी परा शक्ति । शिव को महेश्वर जानना चाहिये और शिवा माया कहलाती हैं ।


      🌏 भववल्लभा उमा ही द्रष्टव्य वस्तुओं का रूप धारण करती हैं और द्रष्टा पुरुष के रूप में शशिखण्ड मौलि भगवान विश्वनाथ ही सब कुछ देखते हैं , उनके ज्ञाता हैं । जो समस्त महापुरुषों के मन की सीमा से परे है उन परमेश्वर शिव और शिवा के उस यथार्थ स्वरूप का वर्णन सम्भव ही नहीं है । जिन्होंने अपने चित्त को महेश्वर के चरणों में अर्पित कर दिया है और जो उनके अनन्य भक्त हैं , उनके ही मन में वे आते हैं और उन्हीं की बुद्धि में आरूढ़ होते हैं । जो भीतर से पवित्र ,शिव का भक्त और विश्वासी हो वह परमेश्वर का कीर्तन करने पर अपना मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है ।


       🚫 यह चराचर जगत देवाधिदेव महादेव का ही स्वरूप है । परन्तु - पशु ( जीव ) भारी माया के पाश में बंधे होने के कारण जगत को इस रूप में नहीं जानते हैं । महर्षिगण उन परमेश्वर शिव के निर्विकल्प परम भाव को न जानने के कारण उन एक का ही अनेक रूपों में वर्णन करते हैं । कोई उन परम तत्व को अपर ब्रम्हरूप और कोई परम ब्रम्ह बताते हैं और कोई आदि अंत से रहित उत्कृष्ट महादेव स्वरूप कहते हैं । 


        🍘 पंच महाभूत ; इन्द्रिय ; अंतःकरण तथा प्राकृत विषय रूप जड़ तत्व को अपर ब्रम्ह कहा गया है । इससे भिन्न समस्त चैतन्य का नाम ही पर - ब्रम्ह है । वृहत और व्यापक होने के कारण उसे ब्रम्ह कहते हैं ।


         🎃 पदार्थों के विषय में जो अनेक प्रकार की असत्य धारणाएं है , उन्हें भ्रांति कहते हैं । यथार्थ धारणा या ज्ञान का नाम विद्या है , तथा जो विकल्प रहित परम ज्ञान है , उसे परम तत्व कहते हैं । सत और असत दोनों का पति होने के कारण शिव , सदसत्पति कहलाते है ।


        🍎 भगवान शिव सबके ईश्वर , पालक ,धारणकर्ता , प्रवर्तक , निवर्तक तथा आविर्भाव और तिरोभाव के एक मात्र हेतु हैं । वे स्वयम् प्रकाश स्वरूप एवं अजन्मा हैं , इस लिए उन परमेश्वर को प्रधान ; पुरुष ; व्यक्त और कालरूप कहा गया है । ( अध्याय 5 श्लोक 20 )


          🌏 जब तक पशु ( जीव ) जिनका कोई दूसरा ईश्वर नही है , उन सर्वेश्वर , सर्वज्ञ , पुराण पुरुष , और तीनों लोकों के शाशक शिव को नहीं देखता , तब तक वह पाशों में बद्ध हो ,इस दुख मय संसार - चक्र में गाड़ी के पहिये की नेमि के समान घूमता रहता है । जब यह द्रष्टा जीवात्मा सबके शाशक ,ब्रम्हा के भी आदि कारण ,सम्पूर्ण जगत के रचयिता , सुवर्णोपम दिव्य प्रकाश रूप , परम पुरुष का साक्षात्कार कर लेता है , तब पुण्य और पाप दोनों को भलीभांति हटाकर , निर्मल हुआ वह ज्ञानी महात्मा - सर्वोत्तम समता को प्राप्त कर लेता है । ( पांचवां अध्याय श्लोक 37 )
   

        इस पोस्ट के साथ ही श्री शिव महापुराण श्रृंखला के समापन की अनुमति चाहता हूँ । अपनी अल्प बुद्धि के कारण , शिव पुराण के ज्ञान के अगाध अमृतमय सागर में से कुछ बून्दों को ही प्रस्तुत कर सका हूँ ,इसके लिए क्षमा प्राथी हूँ -- श्रृंखला को समाप्त करने के पूर्व , महादेव शिव शंकर तथा प्रथम पूज्य गणपति गजानन के राष्ट्रीय स्वरूप की व्याख्या करती हुई करती कुछ पोस्ट्स भी प्रस्तुत है ।


       ***************** क्रमशः ************* राम नाथ गुप्त *********

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