श्री शिव महापुराण पुष्प माला 1967


 पोस्ट ( 1967 )~श्री शिव महापुराण - पुष्प माला 【 १६७ 】- भगवान शिव की पंच मूर्तियां - ब्रम्ह मूर्तियां तथा अष्ट मूर्तियों का विवरण - वायवीय संहिता -( उ ) - अध्याय 3 --

         महर्षि उपमन्यु भगवान श्री कृष्ण को शिव जी की व्यापकता बताते हुए बोले --

      🚫 " श्री कृष्ण ! महेश्वर परमात्मा की मूर्तियों से यह सम्पूर्ण चराचर जगत व्याप्त है । अप्रमेय स्वरूप वाले उन शिव ने अपनी मूर्तियों के द्वारा इस सम्पूर्ण संसार को अधिष्ठित कर रक्खा है ।


     🍎 ब्रम्हा ,विष्णु , रुद्र ,महेशान तथा सदा शिव - इन् पांच मूर्तियों से इस जगत का विस्तार हुआ है । 


     🌏 ईशान ~पुरुष ~अघोर ~वामदेव और सद्योजात ~~ यह महादेव की विख्यात पांच ब्रम्ह मूर्तियां ( स्वरूप ) हैं । 

      🍎 ईशान - यह शिव की श्रेष्ठतम मूर्ति है । विद्वान पुरुष भगवान शिव की ईशान नामक मूर्ति को श्रवणेन्द्रिय ,वाणी , शब्द ,और व्यापक आकाश तत्व की स्वामिनी मानते हैं ।

      🍍 पुरुष - जगत के सम्पूर्ण प्राणियों का सम्मिलित स्वरूप ही शिव की " पुरुष " मूर्ति है । पुराणों के अर्थ ज्ञान में निपुण सभी विद्वानों ने महेश्वर के इस तत्पुरुष नामक विग्रह को त्वचा ,हाथ ,स्पर्श और वायु तत्व का स्वामी समझा है ।

      🌹~~ अघोर - पिनाकपाणी महेश्वर जी की अत्यंत पूजित अघोर नामक मूर्ति है वह धर्म आदि आठ अंगों से युक्त " बुद्धि तत्व " को अपना अधिष्ठान बनाती है । विद्वानों ने शिव की अघोर नामक मूर्ति को - नेत्र ,पैर ,रूप और अग्नि तत्व का अधिष्ठात्री बताया है ।

      🌹 ~~ वामदेव - विधाता महादेव की वामदेव नामक मूर्ति को आगम वेत्ता विद्वान " अहंकार " की अधिष्ठात्री बताते है । महात्मा पुरुष शिव की वामदेव नामक मूर्ति को रसना ,पायु ,रस और जल तत्व की स्वामिनी मानते है ।

      🌹 ~~ सद्योजात - यह "मन" की अधिष्ठात्री मूर्ति है । विद्वान लोग इसे घ्राणेन्द्रिय ,उपस्थ ,गन्ध ,और पृथ्वी तत्व की अधिष्ठात्री मानते है। कल्याण कामी पुरुषों को इनकी सदा ही यत्नपूर्वक वंदना करनी चाहिए ।


     महेश्वर की अष्ट मूर्तियां 

      🍘 देवाधिदेव महादेव को जो आठ मूर्तियां है ,,तत्स्वरूप ही यह जगत है यानी इस जगत की द्योतक हैं । इन आठ मूर्तियों में यह विश्व उसी प्रकार ओतप्रोत भाव से स्थित है , जैसे सूत में मनके पिरोए जाते हैं । यह हैं -- शर्व ,भव , रुद्र ,उग्र ,भीम ,पशुपति , ईशान तथा महादेव ,~~


     शर्व ~~ #पृथ्वी शिव की पृथ्वीमयी मूर्ति सम्पूर्ण जगत को धारण करती है इसके अधिष्ठाता का नाम 

" शर्व " है । यह भूमि ही है ।

       भव ~~ #जल - परमेश्वर की जलमयी मूर्ति समस्त जगत के लिए जीवन दायिनी है ।

        रुद्र ~~ #अग्नि - शिव की घोर रूपिणी तेजोमयी शुभ मूर्ति " रुद्र " विश्व के भीतर और बाहर व्याप्त होकर स्थित है इसलिए यह रौद्री कहलाती है ।

       उग्र -- #वायु -- भगवान शिव वायु रूप से स्वयम् गतिशील होते और इस जगत को गतिशील बनाते हैं साथ ही वे इसका भरण पोषण भी करते है । वायु भगवान की उग्र या औग्री मूर्ति जानी जाती है ।

       भीम ~~ #आकाश - भगवान भीम की आकाश रूपिणी मूर्ति सबको अवकाश देने वाली ,सर्व व्यापिनी है । इसे "भैमी "मूर्ति भी कहते हैं ।

        पशुपति ~~#क्षेत्रग्य -- सम्पूर्ण क्षेत्रों में निवास करने वाली , तथा सम्पूर्ण आत्माओं की अधिष्ठात्री शिव मूर्ति को पशुपति मूर्ति कहते हैं ( समस्त चेतन प्राणी ही पशु हैं )। यह पशुओं ( जीवों ) के पाशों का उच्छेद करने वाली है ।

         ईशान ~~ #सूर्य - माहेश्वर की ईशान नामक मूर्ति ,दिवाकर ( ,सूर्य ) नाम धारण करके सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करते हुए आकाश में विचरती है । 

          महादेव ~~ #चंद्रमा -- जिनकी किरणों में अमृत भरा हैं, जो सम्पूर्ण विश्व को उस अमृत से तृप्त करते रहते हैं , वे चंद्रदेव भगवान शिव के महादेव नामक विग्रह हैं । यह जो आठवीं मूर्ति है वह परमात्मा शिव का साक्षात रूप है तथा अन्य सब मूर्तियों के व्यापक रूप हैं । इसलिए यह सम्पूर्ण जगत ही शिव का रूप है ।


    🌋🍎🌰 जैसे वृक्ष की जड़ को सींचने से उसकी शाखाएं पुष्ट होती है , उसी प्रकार भगवान शिव की पूजा करने से उसके स्वरूपभूत सम्पूर्ण जगत का पोषण होता है । इसलिए सबको अभय दान देना ,सबपर अनुग्रह करना और सबका उपकार कहना -- यह शिव की आराधना माना गया है । 


     🌋🌰🍎 सम्पूर्ण जगत की प्रसन्नता से भगवान शिव प्रसन्न होते है । यदि किसी भी जीव ( देहधारी ) को अनुचित रूप से दंडित ( सताया ) किया जाता है तो उसके द्वारा अष्टमूर्ति धारी सदाशिव का ही अनिष्ट किया जाता है ,और भगवान शिव क्रोधित होते है ।


     🚫 आठ मूर्तियों के रूप में सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त करके स्थित हुए भगवान शिव का पूजन और भजन करना ही सर्व सिद्धिदायक है । सम्पूर्ण ब्रम्हाँड के विराट स्वरूप में स्थित भगवान शंकर को सादर नमन ।

  ****** क्रमशः ************ राम नाथ गुप्त *********

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