श्री शिव महापुराण पुष्प माला 1966


 पोस्ट -( 1966 )- श्री शिव महापुराण ~ पुष्प माला ~ 【 १६६ 】 ~ सिंह का भगवती का दास तथा वाहन व गणाध्यक्ष बनना ; शिव जी के तेजोमय शरीर तथा भगवती की शब्दमयी विभूति - स्थूला ,सूक्ष्म और परा - का वर्णन ~~ वायवीय संहिता { पू } - अध्याय 17 से - 29 तक 

      🚫 परमेश्वर अर्ध नारीश्वर - सदाशिव और ~~ शिवा - से पराशक्ति पाकर सृष्टि करने की इच्छा वाले श्री ब्रम्हा जी ने स्वयम् अपने - आधे भाग से पुरुष रूप और आधे भाग से नारी रूप हो गए । नारी भाग से शतरूपा और पुरुष रूप स्वायम्भू मनु कहलाये । उन देवी शतरूपा ने कठोर तप करके स्वायम्भू मनु को पति रूप में प्राप्त किया । यही मनु और शतरूपा , विशाल सृष्टि के जनक हुए । इनके सम्बंध में विवरण मैं पिछली पोस्ट्स में दे चुका हूँ -

         स्वायंभू मनु अरु शतरूपा । जिनते भई नर सृष्टि अनूपा ।।

         अध्याय 17 से 24 तक श्री शिव जी के चरित्र - सती के दक्ष की यज्ञ में शरीर त्याग करने ,फिर पार्वती के रूप में जन्म लेने और शिव और पार्वती के पुनः मिलन की कथा का वर्णन है जिसे हम पिछली पोस्ट्स में दे चुके है ।

      🍘 पूर्व काल में एक बार जब पार्वती जी ने दुष्कर तपस्या की थी और जब वे तपस्या में रत थीं , तब एक दिन उनके पास एक बहुत बड़ा व्याघ्र ( सिंह ) दुष्ट भाव से आया था , परन्तु पार्वती के निकट आते ही उस दुरात्मा का शरीर जड़वत हो गया । वह भूख से अत्यंत पीड़ित हो रहा था परंतु अब देवी की ओर देखते हुए चित्रलिखित सा खड़े हुए रात दिन मानों देवी पार्वती जी की उपासना करने लगा । भगवती ने उसे अपना उपासक माना और उनकी कृपा से उसके तीनों प्रकार के मल - तत्काल नष्ट हो गए और उसे देवी के स्वरूप का बोध हो गया । फिर उसके अंगों की जड़ता और दुष्टता का स्वभाव भी नष्ट हो गया ।  


        🍎 वह सिंह भगवती का भक्त हो गया और उनकी सेवा करने लगा । अब वह अन्य दुष्ट वन्य पशुओं को खदेड़ते हुए देवी पार्वती की रक्षा करने लगा । भगवती ने उसे अपना वाहन बना लिया और उस व्याघ्र -( सिंह ) को गणाध्यक्ष बनाकर अंत: पुर के द्वार पर सोमनन्दी नाम से प्रतिष्ठित किया । फिर भगवान शंकर की कृपा से वह व्याघ्र उसी छण - लटकती हुई स्वर्णजड़ित बेंत की छड़ी ,रत्नों से जड़ित विशेष कवच ,सर्प की सी आकृति वाली छुरी ,तथा रक्षकोचित वेश धारण करके , गणाध्यक्ष के पद पर प्रतिष्ठित दिखाई दिया ( वायवीय संहिता 27 वां अध्याय श्लोक 33 / 34 )


         🌏 ऋषियों ने वायुदेव से पूछा कि एक बार भगवान शिव ने शिवा से वार्ता में कहा था -

      🌋 ""सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक और वागर्थात्मक है , ऐश्वर्य का सार एक मात्र आज्ञा ही है और वह आज्ञा तुम हो "" इसका अर्थ बताने का कष्ट करें । 

      श्री वायु देव जी बोले --" रुद्र देव का जो घोर तेजोमय शरीर है , उसे अग्नि कहते है और अमृतमय सोम ( चंद्रमा ) शक्ति का स्वरूप है क्योंकि शक्ति का शरीर शांतिकारक है । जो अमृत है वह प्रतिष्ठा नामक कला है और जो तेज है वह विद्या नामक कला है । सम्पूर्ण सूक्ष्म भूतों में वे दोनों रस और तेज हैं ।

        🍘 जो शिवाग्नि से शरीर को दग्ध करके , शक्ति स्वरूप सोमाम्रत से योगमार्ग द्वारा इसे आप्लावित करता है वह अमृत स्वरूप हो जाता है । इसी अभिप्राय से शिव जी ने इस सम्पूर्ण जगत मो अग्निषोमात्मक कहा था ।

 ( - वायवीय संहिता श्लोक 19 / 20 )

           🌋 भगवती की शब्दमयी विभूति तीन प्रकार की है - स्थूला ,सूक्ष्मा और परा । स्थूला वह जो कानों से सुनाई देती है , केवल चिंतन में आने वाली सूक्ष्मा है और चिन्तन की सीमा से भी जो परे है , उसे " परा " कहते हैं । वही शिवतत्व के आधीन रहने वाली परा शक्ति है । इसी को कुंडलनी शक्ति कहा गया है ।

        ☢ यह परा शक्ति सर्वत्र व्यापक है ओर इसे आज्ञा भी कहते है । यही सम्पूर्ण ऐश्वर्य की पराकाष्ठा हैं । इसी परा शक्ति के साथ शिव जी गृहस्थ बने हुए हैं और वह भी सदा शिव जी के साथ उनकी गृहणी बनकर रहती है । शिव कर्ता हैं और शक्ति कारण । #वास्तव_में_एकमात्र_शिव_जी_ही_दोनों_रूपों_में_स्थित_हैं  

#अतः_शिव_जी_परम_कारण_हैं_और_उनकी_आज्ञा_ही_परमेश्वरी_है ।


      ***** क्रमशः ************** राम नाथ गुप्त *********

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