पोस्ट -( 1965 ) -- श्री शिव महापुराण - पुष्प माला - 【 १६५ 】 - काल की महिमा , आदिदेव पुरातन पुरुष अव्यक्त जन्मा , शम्भू भगवान रुद्र - श्री ब्रम्हा जी के पुत्र किस प्रकार हुए ? भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप में प्राकट्य और मैथुनी सृष्टि का आरंभ ~ वायवीय संहिता - अध्याय 7 से 16 तक ~~~
🌏अध्याय ७ में काल की महिमा का वर्णन है । यह सारा संसार मंडल काल के मुख में वर्तमान रहकर , उत्पत्ति तथा प्रलय रूप लक्षणों से लक्षित चक्र की भांति निरन्तर घूमता रहता है । ब्रम्हा , विष्णु ,रुद्र , अन्य देवता तथा असुर जिसके द्वारा बनाये गए नियम को प्राप्तकर उसका उल्लंघन करने में सर्वथा असमर्थ है , अत्यंत भयानक वह काल - भूत , भविष्य ,वर्तमान आदि रूपों में अपने को विभक्त कर ,प्रजाओं को क्षीण करता हुआ ,सर्वसमर्थ होकर स्वछंदता पूर्वक व्यवहार करता रहता है ।
🌋🍎 निमेष ,सेकेंड , मिनटों , घण्टों , दिन , महीनों ,सालों से घटित मूर्तरूप धारण करने वाला माहेश्वर का
" परम तेज ही " कालात्मा कहा गया है , जिसका उल्लंघन समस्त स्थावर और जंगम रूप वाला कोई भी प्राणी नही कर सकता है । सम्पूर्ण जगत काल के वश में है परंतु काल महामृत्युंजय भगवान शिव के वश में है । जिसका न काल है ,न बंधन है , और न मुक्ति है ; जो न पुरुष है और न ही प्रकृति है ,तथा न विश्व है -- उस
"" विचित्र रूप वाले परात्पर शिव "" को नमस्कार है , बारम्बार नमस्कार है ।🌋🍎
🌏 अध्याय 8 में काल का परिमाण व त्रिदेवों की आयु तथा युगों की अवधि आदि का वर्णन है । अध्याय 9 से 12 में सृष्टि के उत्पन्न होने तथा पुरातन इतिहास का वर्णन है जिसका हम पिछली उमा संहिता की पोस्ट्स में वर्णन कर चुके हैं ।
🌏 अध्याय 13 व 14 में -- मुनिगणों ने श्री वायु देव से प्रश्न किया - " पुराणों में वर्णन है कि श्री रुद्र जी ब्रम्हा जी से उत्पन्न हुए "
🍎 " देवताओं में श्रेष्ठ ,विरूपाक्ष ,दीप्तिमान ,कालात्मा , आदिदेव भगवान रुद्र - जो कल्पांत में कुपित होकर ब्रम्हा विष्णु सहित सारे जगत का संहार करते हैं ,वे आदिदेव पुरातन पुरुष , अव्यक्त जन्मा शंभु भगवान रुद्र , ब्रम्हा जी के पुत्र किस प्रकार हुए ?"
🌰 श्री वायु देव बोले -- यही बात ब्रम्हा जी से उन्होंने पूछी थी तब ब्रम्हा जी ने बताया था कि यद्यपि तीनो ही देवता साक्षात महेश्वर से ही उत्पन्न हुए है , फिर भी परस्पर अभिन्नता के कारण ,उन परमेष्ठी ( शिव जी ) की पूर्ण रूप से प्रसन्नता प्राप्त करके आपस मे परिवर्तन भी कर लेते है । पूर्व कल्प में रुद्र ने ब्रम्हा और नारायण को जन्म दिया । इसी प्रकार पुनः किसी दूसरे कल्प में ब्रम्हा ने विष्णु और रुद्र को उत्पन्न किया । पुनः किसी कल्प में ब्रम्हा ने नारायण को और किसी कल्प में रुद्र देव ने ब्रम्हा को उत्पन्न किया है ।
🎃 इस प्रकार प्रतिकल्प में ब्रम्हा ,विष्णु और महेश्वर ,परस्पर हित करने की इच्छा से एक दूसरे से उत्पन्न होते रहते हैं । वास्तव में सुर अनादि है - इनका जन्म नहीं होता है । श्री राम चरित मानस में भी वर्णन है --( बालकाण्ड दोहा 100 )- शिव पार्वती के विवाह के अवसर पर ~~
मुनि अनुसासन गनपतिहि , पूजेउ संभु भवानि ।
कोउ सुनि संसय करै जनि , सुर अनादि जियँ जानि ।।
🌏 अध्याय 15 में भगवान शिव के अर्ध नारीश्वर रूप में प्रकट होने का वर्णन है । जब ब्रम्हा जी के मानसी सृष्टि करने के उपरांत भी सृष्टि में अपेक्षित वृद्धि नही हुयी तब उन्होंने भगवान महाशिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ अर्ध नारीश्वर रूप धारणकर प्रकट हुए । उनका आधा बांयाँ अंग श्री पार्वती का था । तब ब्रम्हा जी ने अनेक सूक्तों द्वारा उन अर्ध नारीश्वर की स्तुति की । श्री ब्रम्हा जी श्री पार्वती जी से बोले --
🍎 " हे देवि ! मेरे द्वारा मानसिक संकल्प से रचे गए प्राणी बारम्बार सृष्टि करने पर भी बढ़ नहीं रहे हैं ,अतः अब मैं मैथुनी सृष्टि करके ही अपनी सभी प्रजाओं की वृद्धि करना चाहता हूँ । हे देवि ! आपसे पहले नारी कुल का प्रादुर्भाव नहीं हुआ है इसलिए नारी कुल की सृष्टि करने के लिए मुझे शक्ती प्रदान करें तथा सब प्रकार की शक्ति व बल प्रदान करने वाली मायारूपिणी देवेश्वरी आपसे प्रार्थना है , कि चराचर जगत की वृद्धि के लिए अपने एक अंश से आप मेरे पुत्र दक्ष की कन्या रूप में जन्म लें "
🌰 श्री ब्रम्हा जी के प्रार्थना करने पर उन रुद्राणी ने अपनी भौहों के मध्य भाग से अपने ही समान कान्तिमयी एक शक्ति प्रकट की । देवेश्वर शिव जी की आज्ञा शिरोधार्य करके उसने दक्ष की पुत्री होना स्वीकार कर लिया । इस प्रकार ब्रम्हा जी को ब्रम्हरूपिणी अनुपम शक्ति देकर वे महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं और महादेव जी अन्तर्ध्यान हो गए ।
तभी से मैथुनी सृष्टि का आरंभ हुआ ।
******** क्रमशः ************** राम नाथ गुप्त *************

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