पोस्ट -( 1964 ) - श्री शिव महापुराण - पुष्प माला -【 १६४ 】 - वायु देव द्वारा - पशु - पाश एवं पशुपति का तात्विक विवेचन -- वायवीय संहिता - अध्याय 1 से 6 तक ~
🍟 एक बार धर्मक्षेत्र नैमिषारण्य में महातेजस्वी और भाग्यशाली मुनियों ने महायज्ञ का आयोजन किया । उस यज्ञ में श्री सूत जी पधारे । मुनियों के द्वारा परम पुरुष के बारे में पूछने पर श्री सूत जी ने मुनियों और ब्रम्हा जी का संवाद सुनाया - उस समय मुनियों के पूछने पर कि " कौन पुरुष सभी प्राणियों से प्राचीन, परम पुरुष , विशुद्ध ,परिपूर्ण शाश्वत और परमेश्वर है और वह किस विचित्र कृत्य से इस जगत का निर्माण करता है ? "श्री ब्रम्हा जी बहुत देर तक ध्यान करने के उपरांत " रुद्र रुद्र " इस प्रकार का उच्चारण करते हुए हाथ जोड़कर कहने लगे --
🙏🍎 " मन और वाणी से जो अगम्य है , जिनके आनन्दमय स्वरूप को प्राप्त करके विद्वान पुरुष किसी से भयभीत नही होता ,जिनसे ये सभी ब्रम्हा , विष्णु ,रुद्र एवं इन्द्रादि देवता उत्पन्न हुए है , जो सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न होने के कारण " सर्वेश्वर ", हैं , हृदयाकाश में रहने वाले वे महेश्वर सभी मुमुक्षुओं द्वारा ध्यान किये जाने योग्य हैं "🙏
🙏🍎 " भगवान शिव के साथ मन:संयोग करने से तथा तात्विक रूप से अपने को उनसे अभिन्न चिंतन करने से जीव सामर्थ्यवान हो जाता है । उनके ध्यान में इस जगत का शाशक हो जाता है और उनकी कृपा से अंत में पशु रूप जगत की माया भी निवृत हो जाती है । जिनके प्रकाश से यह जगत प्रकाशित होता है ,ऐसे एकमात्र प्रभु महेश्वर महादेव ही जानने योग्य है । श्री विष्णु , ब्रम्हा ,रुद्र अन्य देवता और असुर आज भी कठोर तप के द्वारा उनके दर्शन की आकांक्षा रखते है । शिव जी मे भक्ति रखने वाला प्राणी मुक्त हो जाता है "🙏
🌰 नैमिषारण्य में ऋषियों का यज्ञ समाप्त होने पर ब्रम्हा जी की आज्ञा से स्वयम् - " वायु देव " वहां आये । सभी ने उठकर आकाश जन्मा वायुदेव को प्रणाम करके उन्हें सुवर्णयमय आसन प्रदान किया । मुनियों ने वायु देवता से प्रश्न किया -" आपने वह कौन सा ज्ञान प्राप्त किया है जो परम सत्य और शुभ है ? तथा जिसमे निष्ठा रखकर पुरुष परमानन्द को प्राप्त करता है "
🌰 श्री वायु देवता बोले --" अज्ञान से उत्पन्न होने वाला दुःख ज्ञान से दूर होता है । वस्तु के तीन भेद माने गए हैं -- जड़ ( प्रकृति ) ;; चेतन ( जीव ) और उन दोनों का नियंता परमेश्वर ( पशुपति ) । इन्हें तीनो को क्रम से
पशु ,पाश ,और पशुपति -- कहते हैं । तत्वज्ञ पुरुष इन तीनों को क्षर ;; अक्षर ;; और उन दोनों से अतीत कहते हैं । अक्षर ही पशु ~~ क्षर तत्व का नाम पाश तथा ~~ क्षर और अक्षर से जो परम तत्व है उसी को पति या
" पशुपति " कहते है ।
🌹🍎 प्रकृति को ही क्षर कहा गया है -- पुरुष ( जीव ) को ही अक्षर कहते है और दोनों को जो प्रेरित करता है वह तत्व ही परमेश्वर है । माया का नाम ही प्रकृति है -- पुरुष ( जीव ) उस माया से आवृत है - शिव ही इन दोनों के प्रेरक ईश्वर हैं । माया महेश्वर की शक्ति है , नित्य स्वरूप जीव उससे आवृत है । चेतन जीव को आच्छादित करने वाला अज्ञान मय पाश ही मल कहलाता है , उससे शुद्ध हो जाने और जीव स्वत: " शिव " हो जाता है । यह विशुद्धता ही " शिव तत्व " है ।
🌏 यद्यपि जड़ कर्म का चेतन आत्मा से कोई संबंध नही है तथापि अज्ञानवश जीव ने उसे अपने आप में मान रक्खा है । भोग करने से ही कर्म फल का विनाश होता है । प्रकृति को भोग्य कहते है और भोग का साधन है शरीर । ब्राह इंद्रियां और अंतःकरण उसके द्वार हैं । अतिशय भक्तिभाव से उपलब्ध हुए कृपा प्रसाद से मल का नाश होता है और मल के नाश होने पर पुरुष निर्मल शिव के समान हो जाता है ।
🌏 इंद्रजाल के समान एक ही ईश्वर -- वश में करने वाली अपनी माया शक्तियों से ,इन सभी लोकों को वश में करके अपने ऐश्वर्य का विस्तार करता है । सृष्टि के आरंभ में एक ही रुद्रदेव विद्यमान रहते है , दूसरा कोई नही होता । वे ही अपनी शक्ति के साथ मिलकर , जगत की सृष्टि करके , इसकी रक्षा करते है और अंत में सभी का संहार भी कर डालते हैं । विश्व को धारण करने वाली वह " शैवी शक्ति " अजा , चित्राकृति ( अदभुत स्वरूपा ) एवं " परा " आदि नामों से जानी जाती है ।
🎃 वे ही परमेश्वर तीनो कालों से परे ,निष्कल ,सर्वज्ञ ,त्रिगुणाधीश्वर ,एवं साक्षात परम ब्रम्ह हैं , सम्पूर्ण विश्व उन्हीं का रूप है , वे सबकी उत्पत्ति का कारण होते हुए भी स्वयम् अजन्मा हैं , स्तुति के योग्य हैं , प्रजाओं के पालक ,देवताओं के भी देवता , अपने हृदय में विराजमान उन महेश्वर भगवान शिव को बारम्बार सादर प्रणाम है ।
******* क्रमशः ************ राम नाथ गुप्त ************

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