श्री शिव महापुराण पुष्प माला 1963


 पोस्ट ~ ( 1963 )- श्री शिव महापुराण - पुष्प माला 【 १६३ 】-प्रणव ( ॐ ) मीमांसा तथा प्रणवोपासना व सन्यास विधि का वर्णन - कैलाश संहिता - अध्याय 1 से 9 तक ।

      🍎 नैमिषारण्य में ऋषियों के प्रणव विषयक प्रश्न करने पर श्री सूत जी बोले कि - एक बार हिमालय पर्वत पर पति के साथ सुख पूर्वक बैठी हुई महादेवी गौरी ने भी भगवान सदा शिव से पूछा --" हे देव ! आपके द्वारा उपदिष्ट मंत्र प्रणव ( ॐ ) युक्त कहे गए है इसलिए सबसे पहले मुझे प्रणव के निश्चित अर्थ को बताने की कृपा करें ; प्रणव किस प्रकार उत्पन्न हुआ ? ; और यह वेदों का आदि क्यों कहा जाता है ? -- इस प्रणव के बारे में विस्तृत जानकारी देने की कृपा करें "

      🍎 भगवान शिव जी बोले ~"" प्रणव के अर्थ को जान लेना ही मेरा ज्ञान है । प्रणव नामक यह मंत्र सभी विद्याओं का बीज है । यह वेद का सार तथा मेरा स्वरूप है ।

      🌏 तीनो गुणों परे ,सर्वज्ञ , ,देवस्वरूप ,सर्वसमर्थ ,तथा सर्वत्र व्याप्त मैं " शिव " - इस ॐ नामक एकाक्षर मंत्र में निवास करता हूँ । यह प्रणव सभी अर्थों का साधक है "

       🌰 मुझ शिव जी को प्रणव स्वरूप और प्रणव को ही सदा शिव स्वरूप कहा गया है । अतः विकार रहित तथा मोक्ष की इच्छा वाले को चाहिए कि प्रणव ( ॐ ) को ही मुझ सर्वकारण ,निर्गुण परमेश्वर के रूप में ही समझे । मैं काशी में जीवों की मुक्ति के लिए सभी मंत्रों में श्रेष्ठ , इसी प्रणव का उपदेश करता हूँ ""

    

      🎆 प्रणव में सर्वप्रथम निवृति कलारूप " अ "का उद्धार करे ; फिर ईंधन कलारूप उ कार का ; फिर काल कला रूप " म " कार का ; दण्ड कलारूप बिंदु का तथा ईश्वर कला रूप नाद का उदगार करे । इस प्रकार तीन मात्रा ,बिंदु और नाद स्वरूप - पँचवर्ण रूप यह प्रणव , उद्धत किये जाने पर जप करने वालों को सदा मुक्ति प्रदान करता है ।

      🌰 यह ब्रम्हा से लेकर इस जगत के सम्पूर्ण प्राणियों का प्राण ही है ,इसीलिए " प्रणव " कहा जाता है । वेद आदि में मैं हूँ और प्रणव मेरा वाचक है , इसलिए प्रणव को वेदों का भी आदि कहा जाता है ।


       🍟🍅 " सर्व खल्विदं ब्रम्ह " - इस श्रुति से सारा प्रपंच ही ओमकार स्वरूप है । है देवि ! मैं ही जीव और ब्रम्ह की एकत्व भावना से इस प्रणव का विषय हूँ ।🍅


        🍱 सन्यास की दीक्षा लेने वाले को गुरु के पास जाकर ,उनकी आज्ञा लेकर विधिवत नियमों का पालन करते हुए स्थिर चित्त होकर गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिये , फिर गुरु को चाहिए कि शिष्य को त्रिपुंड आदि धारण कराकर उसके दाहिने कान में जोर जोर से तीन बार प्रणव ॐ का उच्चारण करे । इस प्रकार उपासक को मेरा लोक प्राप्त होता है और वह मुझसे ज्ञान प्राप्त करके ,मेरे सायुज्य का फल प्राप्त कर लेता है ।

          कैलाश संहिता में अध्याय 6 तक सन्यास दीक्षा विधि का विस्तृत रूप में वर्णन है । अध्याय 7 में शिव जी के विविध ध्यानों और पूजा विधि का वर्णन है । भगवान बोले --

        🎃 " साधक को षडंग ब्रम्ह मंत्रों , मात्रिका सहित प्रणव , शिव और शक्ति सहित मेरा पूजन करना चहिये । मेरा पूजन के बाद तुम्हारा ( महादेवी ) पूजन करना चाहिये । मेरी पूजा के पांच आवरण है -- मेरे मंडल में स्थित वृत्त में चारों ओर पंच ब्रम्ह देवताओं का क्रम से पूजन करे । मेरी पूजा करने के साथ ही पूर्व भाग में वासुदेव की , दक्षिण में अनिरुद्ध की , उत्तर में संकर्षण की ,और पश्चिम दिशा में प्रद्युम्न की पूजा करें ।  

         🍎साधक को चाहिए कि वह यथाविधि शिव जी की प्रसन्नता के लिए , रौद्र स्वरूप वाले पश्चिमभिमुख छेत्रोपाल की पूजा करे । ऐसी भावना करे -- हास्ययुक्त मुख कमल वाले सभी देवता हाथ जोड़कर देवाधिदेव महादेव और देवी की ओर सतत देख रहे हैं । फिर प्रणव से युक्त शिव का " ॐ नमः शिवाय " महामंत्र से जाप करे और मेरे लिंग की पूजा करे ।


        🍎 परमात्मा शिव जी के मुख्य 8 नाम है -- शिव ; महेश्वर ; रुद्र ; विष्णु ; पितामह ; संसार वैद्य ;सर्वज्ञ और परमात्मा । इस प्रकार प्रणव स्वरूप अव्यवय परमात्मा की स्तुति करके ,विधिवत पूजन करके " मैं ही शिव हूँ " इस प्रकार की भावना कर शिव जी से तादात्म्य स्थापित करना चाहिए ।🌹

   ******* क्रमशः ************** राम नाथ गुप्त ************

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