श्री शिव महापुराण पुष्प माला 1960


 पोस्ट -( 1960 ) - श्री शिव महापुराण - पुष्प माला -【 १६० 】- भगवती उमा के प्रादुर्भाव और देवताओं के अभिमान का हनन --श्री उमा संहिता ~ अध्याय 49 --

     🍎 मुनिजनों द्वारा भगवती भुवनेश्वरी , जो परम ब्रम्ह ,मूल प्रकृति ,ईश्वरी ,निराकार होकर भी साकार एवं नित्यानन्द मयी सती है , उनके उमा के रूप में अवतार लिए जाने के बारे में पूछने पर श्री सूत जी बोले ~


     🍎 एक बार देवताओं ने महान संग्राम में , महामाया भगवती के प्रभाव से दैत्यों को हरा दिया था ,तब उन्हें अपनी शक्ति व सामर्थ्य पर अत्यधिक अहंकार हो गया था और वे स्वयम् अपनी प्रशंशा करने में लगे हुए थे ; ,उसी समय वहां एक पुंजीभूत तेज पुंज प्रगट हुआ । देवी श्यामा के उस अभिमान नाशक , महान तेज पुंज को देखकर आश्चर्य चकित देवेंद्र ने उसके बारे में जानने और परीक्षा करने के लिए पवन देव को भेजा ।

     🍅🌏 उस प्रबल तेज के द्वारा परिचय के बारे में पूछने पर अभिमान से पवन देव बोले --" में जगत का प्राण वायु हूँ । यह चराचर सारा जगत ,सबके आधार स्वरूप मुझ में ही ओतप्रोत है , मैं ही सारे जगत का संचालन करता हूँ "।

       🌰 तब उस तेज ने एक तिनका को सामने रखकर ,उसे उड़ाने की पवनदेव को चुनौती दी । अभिमानी वायु देव ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रयास किया ओरन्तु वे उस तिनके को टस से मस भी न कर सके और लज्जित होकर चले गए । इसके बाद देवेंद्र ने अग्नि देव , वरुण देव को भेजा ,वे भी उस तिनके को न तो जला सके और न ही बहा सके । तब स्वयम् इंद्र उस दुःसह तेज के पास जाने लगे ,परन्तु इंद्र को आते देखकर वह तेज अंतरध्यान हो गया । 

        🍎 फिर आश्चर्य चकित देवताओं के सम्मुख उसी समय करुणामूर्ति ,सच्चिदानन्द स्वरूपणी ,शिवांगना भगवती उमा -उन सब पर अनुग्रह प्रकट करने व उनका अभिमान दूर करने के लिए -- चैत्र शुक्ल नवमी को दोपहर के समय प्रकट हो गईं ।

       🍎 उस असह्र तेज के मध्य विद्यमान ,अपनी प्रभा से दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई ,"" मैं ही ब्रम्ह हूँ "" ऐसा सभी देवताओं को स्पष्ट रूप से बताती हुई ,अपने चारों हाथों में - वरद मुद्रा , पास , अंकुश धारण किये हुए ,रक्त वर्ण के वस्त्र , माला पहने हुए ,पर ब्रम्ह स्वरूपणी महामाया बोली --


        🚱 " मेरे सामने ब्रम्हा , विष्णु व महेश भी गर्व करने में समर्थ नहीं है , तुम देवताओं की तो बात ही क्या है । मैं ही परम ब्रम्ह , परम ज्योति ,प्रणव और युगल रूपिणी हूँ । मैं ही सब कुछ हूँ , मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ।"

      ☢🍎 " मैं कभी स्त्री रूप वाली , कभी पुरुष रूप वाली ,तथा कभी दोनों स्वरूपों वाली हो जाती हूँ , इस प्रकार मैं सर्वस्वरूपा महेश्वरी हूँ । सृष्टि करनेवालेवाले ब्रम्हा , पालन करने वाले विष्णु और संहार करने वाले शिव भी मैं ही हूँ और जगत को मोहने वाली महामाया भी मैं ही हूँ । मेरे ही प्रभाव से तुमने दैत्यों पर विजय प्राप्त की है , उस मुझ शक्ति को न जानकर तुमलोग व्यर्थ में ही अपने को सर्वेश समझते हो ।"


       🍅💞 " ऐंद्रजालिक ( जादूगर ) की तरह मैं ईश्वरी सारे प्राणियों को नचाती हूँ । हे देवताओं ! इस प्रकार मुझे जानकर ,और अपने अपने गर्व का परित्याग करके , भक्ति से युक्त होकर , मुझ सनातनी प्रकृति की आराधना करो ।"

           इस प्रकार देवताओं के गर्व को खंडित करने के लिए भगवती उमा का अवतार हुआ ।

 ******** क्रमशः ************** राम नाथ गुप्त ********

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