श्री शिव महापुराण पुष्प माला 1959


 पोस्ट - ( 1959 )- श्री शिव महापुराण - पुष्प माला -【 १५९ 】- महर्षि सुमेधा की बताई विधि से राजा सुरथ और वैश्य समाधि द्वारा परमेश्वरी भगवती की आराधना करके सुफल मनोरथ होना - उमा संहिता --

      🌹🍎 ऋषि बोले --" राजन ! बन्धन और मोक्ष का कारण सुनो -- संसार के सभी प्राणियी को मोह में डालने वाली #महामाया ही है -सभी प्राणियो ,मनुष्य ,देवता ,दैत्य ,पशु पक्षी सभी माया के आधीन है और उसी महामाया के प्रभाव से मोह में जकड़े रहते है , बड़े बड़े ऋषि महात्माओं को भी यह माया सदा मोहित किये रहती है । इसके बाद ऋषि ने भगवती महामाया की और भी शक्ति , महत्ता और गुणावली का वर्णन किया ।

       🍎 ऋषी बोले --" वे भगवती महामाया #अनादि है , #नित्यस्वरूपिणी है ,वे शक्तिमयी देवी संपूर्ण प्राणियों के भीतर विराजमान रहती है -देहधारियों की जो "#चित्त #शक्ति" है वह महामाया का ही रूप है --यदि अंतःकरण से वे अपना आसन हटा लें तब प्राणी मुर्दे की तरह हो जाता है --इनके प्रकट और अंतर्ध्यान होने में देवताओ के कारण निहित होते है , जब देवता व मानव उनकी स्तुति करते है ,तब वे उनके दुख दूर करने के लिए ,अनेक रूपो को धारण करके स्वेच्छापूर्वक प्रकट हो जाती है -

        👌 फिर राजा ने भगवती जगदम्बा के आराधन की विधि ,पूजा विधि ,होम विधि और मन्त्रो के बारे में पूछा । ऋषि ने उन्हें भगवती की आराधना के नवार्ण मंत्र की दीक्षा दी ~~

     { राजा सुरथ और वैश्य समाधि के मनोवांछित वर पाने का विवरण }

 ******* महादेवि जगतजननी का नवार्ण बीज मन्त्र ----*************

         🍎 ।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।। 🍎

      🎈वाणी ( ऐं ) , माया ( ह्रीं ) , ब्रम्हसूक्त काम बीज - ( क्लीं ), इससे युक्त नवार्ण मन्त्र उपासको को आनन्द और ब्रम्ह का सायुज्जय देने वाला है -- इस मंत्र का अर्थ है --" हे चित्तस्वरूपणी महासरस्वती ! हे सदरूपिणी महालक्ष्मी ! हे आनन्दरूपिणी महाकाली ! ब्रम्हविद्या पाने के लिए हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते है । हे महाकाली - महालक्ष्मी -- महासरस्वती स्वरूपिणी चण्डिके ! तुम्हें नमस्कार है । अविद्या रूप रज्जु ( रस्सी ) की दृढ़ ग्रंथि को खोलकर मुझे मुक्त करो " ।।

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       ♂ ऋषि सुमेधा जी ने सुरथ और समाधि को पूजा की विधि बताते हुए बताया कि , स्नान करने के बाद ,शुद्ध वस्त्र और शुद्ध आसन पर बैठकर कलश स्थापन कर उसका पूजन करके , अष्टकोण् यंत्र बनाकर उसमे नवार्ण मन्त्र के सभी 9 अक्षरो को अंकित करे या भगवती की मूर्ति की स्थापना करके उसका पूजन करना चाहिए ।

      ♀ यंत्र या मूर्ति की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करे । राजन ! खूब सावधान होकर वेदोक्त विधि से उच्चारण करके यत्नपूर्वक देवी जी की पूजा करनी चाहिए । फिर मन में भगवती का ध्यान करते हुए नवार्ण मन्त्र का जाप करना चाहिए --फिर दशांश हवन करें --हवन का दशांश तर्पण -- और उसका दशांश ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए -- प्रतिदिन देवी के तीनों चरित्रो ( प्रथम मधु कैटभ संहार - दूसरा महिषासुर मर्दन का मध्यम चरित्र तथा शुम्भ निशुम्भ वध का उत्तम चरित्र )--का पाठ करना चाहिए । धूप , दीप नैवेद्य , फल फूल ,जल ,गीत ,वाद्य ,स्त्रोत पाठ ,और वेद पारायण सभी प्रकार से देवी की पूजन होती है । प्रातः , दोपहर और सायंकाल तीनो समय पूजा करनी चाहिए ।

      ♀ विधि के साथ अश्वनी तथा चैत्र मास के दोनों नवरात्र -व्रत करने का भी विधान है--- अनुष्ठान पूरा होने पर चीनी और शहद मिली हुयी खीर से -- या उत्तम विल्व पत्र से -- या शकर मिले तिल से हवन करना चाहिए 

      🍓 ब्राह्मण , वैश्य , शूद्र ,सधवा ,विधवा कोई भी हो , सभी को बिना भेद भाव के भगवती की पूजा व साधना करने का हक है । इस प्रकार से माँ की आराधना करने से सभी दुख समाप्त होकर सर्व सुखों की प्राप्ति होती है ।

        

       🎃 ऋषि सुमेधा ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य को इसी प्रकार से महादेवी की आराधना करने का आदेश दिया और अपने श्री मुख से ध्यान बीज के साथ उपर्युक्त नवार्ण मन्त्र प्रदान किया - दोनो ने नदी के किनारे जाकर विधि से देवी चरित्रो के पाठ और मन्त्र का जाप शुरू किया - समय समय पर मुनि वहां आकर उन्हें निर्देश भी देते रहे - उन दोनों के मन की चिंताएं व दुख सभी स्वतः ही दूर हो गए । तपस्या करते हुए 2 वर्ष बीतने पर उन्हें स्वप्न में देवी के दर्शन हुए । परंतु वे साक्षात दर्शन चाहते थे इसलिए निरंतर तपस्या व पूजन जाप तथा अनुष्ठान करने में लगे रहे ।

       🌰 तीसरा साल पूरा होने पर एक दिन भगवती प्रसन्न होकर उनके सम्मुख प्रगट हो गयी । देवी द्वारा वर मांगने की बात कहने पर राजा सुरथ ने अपने राज्य की वापसी की मांग की । देवी ने एवमस्तु कहते हुए सुरथ को 10 ,000 वर्षो तक निष्कंटक राज्य करने का वरदान दिया -- 


       🍎 🍍 परंतु वैश्य समाधि का सन्सार से मोह नष्ट हो चुका था । उसने माया मोह से विरक्ति के साथ भक्ति और मुक्ति की देवी जी से याचना की । माँ ने उसे भी मन चाहा वरदान प्रदान दिया ।

         🍎 तभी सुरथ के राज्य के मंत्री व अधिकारी जो पहले दुश्मनों के साथ मिल गए थे , वहां आये और राजा के चरणों मे गिर कर उन्होंने क्षमा मांगते हुए बताया कि दुश्मन समाप्त हो गए है ; अब राजा चलकर अपना राज्य सम्भालें । मुनि सुमेधा की आज्ञा लेकर राजा सुरथ अपने राज्य वापस चले गए और समाधि वैश्य भक्ति में लीन होकर तपस्या व साधना करते हुए संसार के बंधनों से मुक्ति पाकर मां के अति दुर्लभ #मणि #लोक को पा गए ।

        🌏 इस प्रकार भगवती की साधना से संसार के सभी #सुख या #भक्ति #मुक्ति जो भी साधक चाहे उसे सुलभ हो जाती है --- माँ जगतजननी को शत शत बार प्रणाम ,--

                                                      ।। ॐ नमश् चण्डिकाये ।।

      **** अगली पोस्ट में ******* राम नाथ गुप्त कन्नौज **************

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