श्री रामायण जी की कथाएँ 146


 पोस्ट -( 146 ) - श्री रामायण जी की कथायें -- जीवित होते हुए भी मृतक के समान होते है - यह 14 प्रकार के प्राणी ---- ( द्वितीय भाग ) -

        कौल काम - बस कृपिन बिमूढ़ा । अति - दरिद्र अजसी अति - बूढ़ा ।।

        सदा - रोगबस सन्तत - क्रोधी । बिष्नु - बिमुख श्रुति सन्त - विरोधी ।।

        तनु - पोषक निंदक अघ ख़ानी । जीवत सव - सम चौदह प्रानी ।।

      पिछली पोस्ट 145 में प्रथम सात प्रकार के प्राणियों के बारे में वर्णन किया जा चुका है ।


🍟 8--. सदा रोगवश- #निरंतर #रोगग्रस्त रहने वाले व्यक्ति को भी #मृतक समान ही माना गया है। ऐसे व्यक्ति का मन हमेशा विचलित रहता है। नकारात्मकता उस पर हावी रहती है। हमेशा नकारात्मक सोचते रहने से भी उसके स्वस्थ होने में रुकावट पैदा हो जाती है। ऐसा व्यक्ति खुद ही मरने की सोचने लगता है । इस तरह की सोच से वह जीवित होते हुए भी स्वस्थ्य जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है। ऐसे व्यक्ति अपने आहर में बदलाव करें, नियमित योग करें और नियमित ध्यान करें, तो वह प्रभु कृपा से स्वस्थ हो सकते है।

 

🍟 9----. संतत- क्रोधी- #निरंतर #क्रोध में रहने वाले व्यक्ति को तुलसीदासजी ने संतत क्रोधी कहा है। हर छोटी-बड़ी बात पर जिसे क्रोध आ जाए ऐसा व्यक्ति भी मृतक के समान ही है। क्रोधी व्यक्ति के अपने मन और बुद्धि, दोनों ही पर नियंत्रण नहीं रहता है। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता है। ऐसा व्यक्ति न खुद का भला कर पाता है और न परिवार का। उसका परिवार उससे हमेश त्रस्त ही रहता है। सभी उससे दूर रहना पसंद करते हैं।

 

🍟 10.--- विष्णु विमुख- ( नास्तिक ) भगवान विष्णु के प्रति प्रीति नहीं रखने वाला, अस्नेही या विरोधी। इसे ईश्‍वर विरोधी भी कहा गया है। ऐसे #परमात्मा #विरोधी व्यक्ति मृतक के समान है। ऐसे अज्ञानी लोग मानते हैं कि कोई परमतत्व है ही नहीं। जब परमतत्व है ही नहीं तो यह संसार स्वयं ही चलायमान है। हम ही हमारे भाग्य के निर्माता है। हम ही संचार चला रहे हैं। हम जो करते हैं, वही होता है। #अविद्या से ग्रस्त ऐसे ईश्‍वर विरोधी लोग मृतक के समान है जो बगैर किसी आधार और तर्क के ईश्‍वर को नहीं मानते हैं। उन्होंने ईश्‍वर के नहीं होने के कई #कुतर्क एकत्रित कर लिए हैं।

 

🍟11--. श्रु‍ति और संत विरोधी- --- #वेदों को #श्रुति कहा गया है और स्मृतियां, रामायण, पुराण आदि को स्मृति कहा गया है। श्रुति ही हिन्दु धर्म का एकमात्र धर्मग्रंथ है। यहां तुलसीदासजी कह रहे हैं कि श्रुति विरोधी अर्थात वेद विरोधी इस धरती पर मृतक के समान है। वेद के बाद #संत #विरोधी लोग भी मृतक समान है। बहुत से संत आजकल #स्वयंभू #संत है। हिन्दू संत धारा में संत तो 13 अखाड़े और दसनामी संप्रदाय में दीक्षित होकर ही संत बनते हैं। ऐसे में संत की परिभाषा को समझना जरूरी है। स्वयंभू भी संत हो सकता है और दीक्षित व्यक्ति भी। जिसने वैदिक यम-नियमों का पालन किया, ध्यान, क्रिया और प्रणायाम का तप किया- वही संत होता है। इसके अलावा ज्ञान और भक्ति में डूबे हुए लोग भी संत होते हैं।

 

🍟 12---. तनु पोषक- --तनु पोषक का अर्थ खुद के #तन और #मन को ही #पोषित करने वाला। खुद के स्वार्थ और आत्म संतुष्टि के लिए ही जीने वाला व्यक्ति। ऐसे व्यक्ति के मन में किसी भी अन्य के लिए कोई भाव या संवेदना नहीं होती। ऐसा व्यक्ति भी मृतक के समान ही होता है। जो खाने-पीने में, पहने-ओढ़ने में, घुमने-फिरने में हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले मुझे मिलें, बाकि किसी अन्य को मिले न मिले। ऐसे लोगों के मन में अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए कोई भावना नहीं होती है। यह सभी के लिए अनुपयोगी और मृतक समान हैं। ये खुद की कमाई को खुद भी ही खर्च तो करेंगे ही दूसरे की कामाई का भी खाने की आस रखेंगे।

 

🍟 13.-- निंदक- ---कई ऐसे लोग होते हैं जिनका काम ही पर #निंदा करना होता है। उन्हें इससे मतलब नहीं रहता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। उन्हें तो दूसरों में कमियां ही नजर आती है। कटु आलोचना करना ही उनका धर्म होता है। ऐसे लोग किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकते हैं। ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे। ऐसे लोग भी मृतक समान ही होते है ।

 

🍟 14. अघ - खानी- समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो #पाककर्म के द्वारा धन या संपत्ति अर्जित करके अपना और परिवार का #पालन- #पोषण करते हैं। ऐसे व्यक्ति भी मृतक समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। पाप की कमाई पाप में ही जाती है।


         इन 14 प्रकार के व्यक्तियों को मृतक समान माना जाता है- इन् दुर्गुणों से बचना चाहिए ।

    " राम कृपा नासहिं सब रोगा । जो एहि भांति बने संजोगा ।।

      ****** क्रमशः ********** राम नाथ गुप्त *******

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