पोस्ट --( 144 ) श्री रामायण जी की कथायें -- भक्ति , विवेक , व्यवहार कुशलता से भरपूर अनुपम नारी -
" त्रिजटा " का दिव्य चरित्र -- द्वितीय भाग --
🍓 ज्ञान गुणसागर हनुमान जी ने भी जब अशोकवाटिका में सीता जी की विपत्ति देखी तो उनके प्रबोधके लिये उन्हें कोई उपाय सूझा ही नहीं । वे सीताजी के रूप और स्वभाव दोनों ही से अपरिचित थे । उन्होंने त्रिजटा प्रयुक्त विधिका ही #अनुसरण किया । रावण त्रासिता सीताजी को " राम सुयश " सुनने से ही सांत्वना मिली थी, तब हनुमान् जी ऊपर पल्लवोंमें छिपे बैठे देख रहे थे । त्रिजटाके चले जानेके बाद सीताजी और भी व्याकुल हो उठी । तब उनकी परिशान्ति के लिये हनुमान जी ने भी श्रीराम गुणगान सुनाये ।
🎃 दानवी होनेके कारण त्रिजटा में दानव मनोविज्ञान का ज्ञान तो था ही । दानवों का अधिक विश्वास " #दैहिक #शक्ति " मे है और इसीलिये उन्हें कार्यविरत करनेमें भय अधिक कारगर होता है । सीताजी को वशीभूत करने के लिये रावणने भय और त्रासका सहारा लिया था और तदनुसार राक्षसियों को ऐसा ही अनुदेश करके यह चला गया था । सीताजीका दुख दूना हो गया, क्योंकि राक्षसियाँ नाना भाँति बह्यंकर रूप बना बनाकर उन्हें डराने धमकाने लगी। व्यवहार-विशारद त्रिजटा के लिये यह असह्य हो गया ।
🌰 सीता जी के दुखों का वर्जन के लिये उस पण्डिता ने विवेकपूर्ण एक युक्ति निकाली । उसने राक्षस मनोविज्ञान का सहारा लिया और एक " भयानक स्वप्न कथा " की सृष्टि की ।उसने सब राक्षसियों को बुलवाकर कहा सब सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो।
त्रिजटा ने उन राक्षसियों से कहा की मैंने एक स्वप्न देखा है। स्वप्नमे मैंने देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी । राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी । रावण नंगा है और गधे पर सवार है । उसके सिर मुँड़े हुए हैं बीसो भुजाएँ कटी हुई है । इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका बिभीषण ने पायी है। लंका में श्री रामचंद्र जी की दुहाई फिर गयी है । तब प्रभुने सीताजीको बुलावा भेजा । पुकारकर (निश्चय के साथ ) कहती हू कि यह स्वप्न चार ( कुछ ही) दिनों में सत्य होकर रहेगा । उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयी और जानकी जी के चरणों पर गिर पड़ी।
🍎 इस स्वप्न वार्तासे एक ओर जहाँ त्रिज़टा का #भविष्य #दर्शिनी होना सिद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर उसका " #व्यवहार- #निपुणा " और " #विवेकिनी " होना भी उद्धाटित होता है।भय दिखाकर दूसरे को वशीभूत करनेवाली मण्डली को उसने भावी भयकी सूचना देकर मनोनुकूल बना लिया । प्रत्यक्ष वर्जन मे तो राजकोप का डर था, अनिष्ट की सम्भावना थी । उसने उन राक्षसियों को साक्षात भक्तिरूपा सीता जी के चरणों में डाल दिया ।
🎄 🎆 यही तो भक्तो और संतो का स्वभाव है।
लंका काण्डके युद्ध- प्रसंग में त्रिज़टा की #चातुरी का एक और विलक्षण उदाहरण मिलता है । राम रावण युद्ध चरम सीमापर है । रावण घोर युद्ध कर रहा है । उसके सिर कट-कट करके भी पुन: जुट जाते हैं । भुजाओ और सिरों को खोकर भी वह नवीन सिरों और भुजावाला बन जाता है और श्रीराम के मारे भी नहीं मरता । अशोक वाटिका में त्रिज़टा के मुँहसे यह प्रसङ्ग सुनकर सीताजी व्याकुल हो जाती हैं । श्री रामचंद्र के बाणों से भी नहीं मरनेवाले रावणके बन्धनसे वह अब मुक्त होनेकी आशा त्याग देनेको हो जाती हैं । त्रिजटा को परिस्थितिवश अनुभव होता है । वह सीताजी की मनोदशा को देखकर फिर प्रभु श्रीरामके बलका वर्णन करती है और सीता को श्रीराम की विजय का विश्वास दिलाती है।
🍎 त्रिजटाने कहा- राजकुमारी ! सुनो, देवताओ का शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ।परन्तु प्रभु उसके हृदय मे बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमे जानकी जी (आप) बसती हैं । श्री राम जी यही सोचकर रह जाते हैं कि इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हदय मे मेरा निवास है और मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं । अत: रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा । यह वचन सुनकर, सीताजी के मन में अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा- "सुन्दरी ! महान #सन्देह का #त्याग कर दो अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा । सिरोंके बार बार कट जाने से जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जायेगा और उसकी मृत्यु होगी।
🎈 संतो ने सीता माँ को साक्षात् भक्ति ही बताया है। रावण भक्ति को जबरन अपने बल से प्राप्त करना चाहता है, परंतु क्या भक्ति इस तरह प्राप्त होती है ? भक्ति तो "संतो के संग से ", " प्रभु लीला चिंतन " एवं " जानकी जी की कृपा दृष्टि " से ही प्राप्त हो सकती है । जानकी माता ने तो कभी रावण की ओर दृष्टि तक नहीं डाली । रावण को पता था की प्रभु से वैर करने पर उन्हें उनके हाथो मृत्यु होगी तो मोक्ष प्राप्त हो जायेगा परंतु प्रभु "चरणों की भक्ति " नहीं प्राप्त होगी।
🎈 जानकी माता ने पुत्र कहकर हनुमान जी से और माता कहकर त्रिजटा से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया। किशोरी जी की कृपा हो गयी तब राम भक्ति सुलभ है। हनुमान जी को और त्रिजटा को सीता माँ ने "अखंड भक्ति" का दान दिया है । सीता जी के प्राणों की रक्षा करने में और उनकी पीड़ा कम करने में हनुमान जी और त्रिजटा का मुख्य सहयोग रहा है। संतो ने कहा है लगभग २ वर्ष तक सीताजी लंका में रही । त्रिजटा अत्यंत भाग्यशाली रही कि राक्षसी होने पर भी उन्हें साक्षात् भक्ति श्री सीता जी का प्रत्येक क्षण संग मिला,सेवा मिली और प्रेम मिला।
🎃 भगवान् के पास देने के लिए सबसे छोटी वस्तु कोई है तो वो है मोक्ष और भगवान् के पास देने के लिए सबसे बड़ी वस्तु कोई है तो वह है भक्ति। भगवान् संसार की बड़ी से बड़ी वस्तु और भोग प्रदान कर अपना पीछा छुडा लेते है ,परंतु अपने चरणों की "अविचल भक्ति" नहीं देते । नारी भक्ताओ का चरित्र हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ रहा है, लंका में सर्वश्रेष्ठ भक्ता निसंदेह त्रिजटा है ।
🎈इस प्रकार त्रिजटा चरित्र #भक्ति, #विवेक और #व्यवहार #कुशलता का एक #मणिकाञ्चन योग है
********** क्रमशः ************ राम नाथ गुप्त ***********

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