श्री रामायण जी की कथाएँ 143,देवोपम गुणों से भरपूर श्रीराम भक्ता " त्रिजटा " जी


 पोस्ट ( 143 ) श्री रामायण जी की कथाएँ -- 🎈देवोपम गुणों से भरपूर श्रीराम भक्ता " त्रिजटा " जी 🎈

 प्रथम पोस्ट --

       🍓श्री रामचरित मानस के छोटे-से-छोटे पात्र भी विशेषता संपन्न है। इसके स्त्री पात्रों में त्रिजटा एक लधु स्त्री पात्र है । यह पात्र आकार में जितना ही छोटा है, महिमा में उतना की गौरव मण्डित है । सम्पूर्ण ‘मानस’ में केवल सुन्दरकाण्ड और लंका काण्डमें सीता-त्रिजटा संवाद के रूपमें त्रिजटा का वर्णन आया है, परंतु इन लघु संवादो में ही त्रिजटा के चरित्र की भारी विशेषताएँ निखर उठी हैं । 

         मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाईं में त्रिजटा का स्वरूप इस प्रकार 

          त्रिजटा जाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ।।


        प्रस्तुत पंक्ति त्रिजटाके चार गुणोंको स्पष्ट करती है-

        १- वह राक्षसी है। २-श्री रामचरण में उसकी रति है। 

        ३ -वह व्यवहार-निपुण और ४ -विवेकशीला है ।


       🎃 राक्षसी होते हुए भी -- श्री रामचरणानुराग, --- व्यवहार कुशलता एवं --- विवेकशीलता जैसे दिव्य

 देवोपम गुणों की अवतारणा चरित्र में अलौकिकता को समाविष्ट करती है । सम्भवत: इन्ही तीन गुणों के समाहार के कारण उसका नाम " त्रिजटा " रखा गया हो । संत कहते है इनके सिर पर -- #ज्ञान,-- #भक्ति और -- #वैराग्य रुपी तीन #जटाएं है अतः इनका नाम " #त्रिजटा " है।


     🍎 त्रिजटा रामभक्त विभीषणजी की पुत्री है। इनकी माता का नाम "शरमा " है। वह रावण की भ्रातृजा है।

 ---- #राक्षसी उसका " #वंशगुण " है और ----- #रामभक्ति उसका " #पैतृकगुण "। लंका की अशोक वाटिका में सीता जी के पहरे पर अथवा सहचरी के रूपमें रावणद्वारा जिस स्त्री-दल की नियुक्ति होती है, त्रिजटा उसमें से एक है । अपने सम्पूर्ण चरित्र में सीता के लिये इसने " #परामर्शदात्री " एवं " #प्राणरक्षिका " का काम किया है । यही कारण है कि विरहाकुला और त्रासिता सीताने त्रिज़टा के सम्बोधन में " #माता " शब्द का प्रयोग किया है।


                   🍓 त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तें मोरी।।

         ऐसी शुभेच्छुका के लिये माँ शब्द कितना समीचीन है। त्रिज़टा की रति राम-चरण में है । रामभक्त पिता

की पुत्री होनेके कारण इसका यह अनुराग "पैतृक सम्पत्ति है " और स्वाभाविक है । त्रिजटा के घर में निरंतर रामकथा होती है । अभी माता सीता से मिलने के थोडी देर पहले वह घर से आयी है, जहाँ हनुमान जी जैसे परम संत श्री बिभीषणजी से रामकथा कह रहे थे ।

          तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम । सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।

    

         🍎 राक्षसी होते हुए भी त्रिजटा को मानव-मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान है । वह सीताजी के स्वभाव और मनोभाव को अच्छी तरह समझती है । वह यह भलीभांति जानती है कि सीताजी को सांत्वना के लिये और उनके दुखों को दूर करने के लिये #रामकथा से बढकर दूसरा कोई उपाय नहीं है । सीता जी का विरह जब असह्य हो चला तब मरणातुर सीताजी आत्मत्याग के लिये जब त्रिजटा से अग्नि की याचना करती हैं , सीताजी त्रिजटा से कहती है के चिता बनाकर सजा दे और उसमे आग लगा दे, तो इस अनुरोंध को वह बुद्धिमान राम भक्ता यह कहकर टाल देती है कि रात्रि के समय अग्नि नहीं मिलेगी और सीता जी के प्रबोधके लिये वह राम यश #गुणगान का सहारा लेती है ।


   ***** क्रमशः ****** राम नाथ गुप्त *****

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