श्री रामायण जी की कथाएँ 142,पवनसुत महावीर श्री हनूमान जी के जीवन का प्रेरक प्रसंग


 पोस्ट - ( 142 ) - श्री रामायण जी की कथायें -- संसार मे जो कुछ भी हो रहा है वह ईश्वरीय विधान है ,

   हम आप केवल निमित्त है -- यह भृम न पाले कि 🎆" मैं न होता तो क्या होता ?" 🎆


    पवनसुत महावीर श्री हनूमान जी के जीवन का प्रेरक प्रसंग...,

      🍓 एक बार हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि अशोक वाटिका में जिस समय श्री सीता जी के वचनों को सुनकर - रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा, तब मुझे लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, और रावण को समझाया - ( सुंदर कांड 9 / 10 )

         सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ।।


      यह देखकर मैं गदगद् हो गया...ओह प्रभु, आपने कैसी शिक्षा दी! यदि मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि 🎈 यदि मै न होता तो क्या होता..?


       🍓 बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मुझे भी लगता कि यदि मै न होता तो सीताजी को कौन बचाता.? पर आप आपने उन्हें बचाया ही नही, बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया, तब मै समझ गया कि आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं, 🎈 किसी का कोई महत्व नहीं है...!!!


      आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा -- ( सुंदर कांड 10 / 11 ) 

       🍓 सपने बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ।।


      🌰 लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो मै बड़ी चिंता मे पड़ गया कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है तो मै क्या करुं...? पर रावण के दरबार मे जब रावण के सैनिक तलवार लेकर मुझे मारने के लिये दौड़े तो मैंने अपने को बचाने की तनिक भी चेष्टा नहीं की ( सुंदर कांड 23 / 24 ) 

         सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना । बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना ।।

         सुनत निसाचर मारन धाये । सचिवन सहित विभीषन आये ।।

         नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति विरोध न मारिअ दूता ।।

         आन दंड कछु करिअ गोसाईं । सबही कहा मंत्र भल भाई ।।


      और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो मै समझ गया कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया...!!


       आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने निशाचरों से कहा- ( सुंदर कांड 24 )

         कपि के ममता पूंछ पर , सबहि कहउँ समुझाइ ।

         तेल बोरि पट बाँधि पुनि , पावक देहु लगाइ ।।


       कि बंदर को मारा नही जायेगा - इसके पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो मैं गदगद् हो गया कि ---  

      उस लंका वाली निशाचरी संत त्रिजटा की ही बात पूर्णतया सच थी, 

    🎈 वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात हैं...!!! 🎈


      🎆🎆 🎈 इसलिए हमेशा याद रखें, कि संसार मे जो कुछ भी हो रहा है, वह सब #ईश्वरीय #विधान है, हम और आप तो केवल #निमित्त #मात्र हैं, इसीलिए कभी भी यह भ्रम न पालें कि

      🎈🎈🎈🎈🎈 मै न होता तो क्या होता..!!!🎈🎈🎈

****** क्रमशः *********** राम नाथ गुप्त *******

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