श्री रामायण जी की कथाएँ 140


 पोस्ट --( 140 ) -- श्री रामायण जी की कथाएँ-- भगवान श्री राम ने 11000 वर्षों तक धर्मानुकूल राज्य किया -- तथा श्री भरत की गन्धर्वराज शैलूष पर विजय व पुष्करावती व तक्षशिला नगरों की स्थापना --

श्री बालमीक रामायण - उत्तर कांड - सर्ग 99 से 102 तक --

        🍓 नैमिषारण्य में श्री राम जी का अश्वमेध यज्ञ पूर्ण होने के बाद , आगंतुक वानरों ,राक्षसों , राजाओ , मुनियो आदि को विधिवत बिदा करने के बाद , श्री सीता जी का मन मे स्मरण करते हुए ,भाइयो , दोनो पुत्रो आदि के साथ भगवान श्री राम ने अयोध्या में प्रवेश किया -- 

        प्रभु श्री राम अपने दोनों पुत्रों के साथ रहने लगे , उन्होंने कोई दूसरा विवाह नही किया -यज्ञ आदि में जब भी धर्मपत्नी की आवश्यकता होती ,श्री रघुनाथ जी श्री सीता जी की स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे - ग्यारह हजार वर्षों तक श्री राम ने धर्मानुकूल राज्य किया - इस अवधि में उन्होंने पर्याप्त दक्षिणा से युक्त बहुत से अश्वमेध यज्ञ , बाजपेय यज्ञ आदि अनुष्ठान किये -


         🎈श्री राम के राज्य में कोई दीन और दुखी नही था , सब सम्पन्न , विद्वान थे तथा किसी की अल्प मृत्यु नही होती थी तथा सभी स्वस्थ थे रोग आदि नही थे - पिता के सामने पुत्र की मृत्यु कभी नही होती थी -मेघ समय पर वर्षा करते थे - कभी अकाल नही पड़ता था 

       दीर्घकाल व्यतीत होने पर समय आने पर पुत्र पौत्रों से घिरी हुई , तीनी माताएं - कौशल्या , सुमित्रा और कैकेयी , काल धर्म ( मृत्यु ) को प्राय हुई -

      

      ~श्री भरत जी ने अत्याचारी मायावी गंधर्वो को जीत कर ~ (गाँधार ,सीमांत प्रदेश और सिंध में )~अपने पुत्रो के नाम पर पुष्करावती और तक्षशिला की स्थापना की थी~

        🎈रामायण काल में , गांधार से लेकर सिंध तक देवता जाति के गंधर्वो से भिन्न ~स्वच्छंदाचारी, अत्यंत मायावी , क्रूरकर्मा , और हिंसा परायण , शैलूष वंशीय गंधर्वो का राज्य था । इनके अत्याचारो से परेशान होकर ~इनके पड़ोसी ~कैकय देश के अधिपति ,भरत के मामा महाराजा युधाजित तथा अन्य राजाओ ने ~अयोध्यापति राजा श्री राम जी के पास अपने पुरोहित ब्रम्हर्षि " गार्ग्य "के द्वारा सन्देश भेजकर सहायता के लिए आर्त पुकार की । तब श्री राम जी ने इसकी जिम्मेदारी श्री भरत जी व उनके पुत्रो पुष्कल और तक्ष को सौंपी । श्री भरत जी अपने पुत्रों के साथ ,विशाल सेना लेकर , श्री राम जी से विजय का आशीर्वाद लेकर ,युद्ध के लिए ~मत्स्य, शूरसेन, कुरुक्षेत्र ,शाल्व, शिवि, नगरो से होते हुए गंधर्वो के राज्य में पंहुचे !


        🍓 भरत की विशाल सेना को आया जान , गंधर्वराज के पुरोहित , "नाडायन " ने गंधर्वराज शैलूष से , श्री भरत जी के अतुलित पराक्रम को बताते हुए कहा कि ~भरत जी ~भगवान् विष्णु के अंश ~#प्रद्दुमन ~रूप है जिन्होंने अनेको बार राक्षसो को हराया तथा रावण के नाना सुमाली का भी वध किया था ~इसलिए युद्ध आत्मघाती होगा परंतु गंधर्वराज नही माना ~

        🍓 भरत के पराक्रम और विशाल सेना देखकर , गंधर्वराज ने मायावी और छद्म युद्ध करते हुए पहले अयोध्या से रात्रि में ही ~महिलाओ को चुराकर ~उन्हें युद्ध में सामने रखने की बात सोची परंतु जब उसके सैनिक अयोध्या पंहुचे तब वहां उन्हें ~ शंख ,चक्र, गदाधारी श्री विष्णु ,स्त्रिओ की ऱक्षा करते हुए मिले ,सैनिक भयभीत होकर भाग आये ~फिर गंधर्वराज ने रात को सोते हुए भरत व सेना को धोखे से मार डालने को सैनिक भेजे परंतु वे भी भयभीत होकर भाग गए ~

     सीम कि चापि सकई कोई तासू । बड़ रखवार रमापति जासू ।।

     भरत सरिस को राम सनेही । जग जपु राम , राम जपु जेही ।।


       🎈 भरत की सेना व गंधर्वराज की सेना में सात दिनों तक भयानक युद्ध हुआ ~भरत के रथ के सारथी उनके मामा युधाजित हुए ~गन्धर्व शैलूष ने अत्यंत मायावी युद्ध किया परंतु श्री भरत जी ने अपने दिव्य बाणो सम्वर्त अस्त्र तथा रुद्रास्त्र से गंधर्वराज शैलूष ,उसके पुत्रो और इनकी 3 करोड़ सेना का वध कर दिया ।

      🎈देवराज इंद्र ने वहां आकर श्री भरत जी का अभिवादन किया ~फिर भरत जी ने अपने दोनों पुत्रो ~पुष्कर और तक्ष के नामपर दो विशाल नगरो ~पुष्करावती ~और तक्षशिला~की स्थापना कर ~दोनों पुत्रो का राज्याभिषेक किया ~ पांच वर्ष वहां रुककर उन राजधानियों को अच्छी प्रकार आबाद करके , भरत जी अयोध्या वापस लौट आये।

      वे दोनों नगर धनधान्य और रत्न समूहों से भरे थे -- अयोध्या वापस आकर उन्होंने भगवान श्री राम को सभी समाचार दिया --

   ( मुस्लिम शाशको के द्वारा विनाश किये जाने के पूर्व तक ~तक्षशिला विश्वविद्यालय ~शिक्षा का विश्व प्रसिद्द केंद्र था )


  🎆 फिर श्री राम ने सुमित्रानन्दन श्री लक्ष्मण के पुत्रों अंगद और चंद्रकेतु के बारे में विचार किया -- 

" कारूपथ " देश पर अधिकार करके " अंगद " को वहां का राजा बनाया -और उनके लिए " आंगदिया " नामक विशाल पूरी को बसाया ---- फिर चंद्रकेतु के लिए मल्ल देश मे " चंद्रकांता " नामक विशाल दिव्य पुरी बसाकर चंद्रकेतु को वहां का शाशक बनाया --

 **** क्रमशः ******* राम नाथ गुप्त कन्नौज *****

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