श्री रामायण जी की कथाएँ 139


 पोस्ट --( 139 )-- श्री रामायण जी की कथाएँ - 🎈 श्री सीता जी का शपथ ग्रहण व रसातल में प्रवेश ***श्री बाल्मीक रामायण महाकाव्य - उत्तर कांड - सर्ग 94 से 100 तक --

         🍎भगवान श्री राम ने लव और कुश से सुमधुर स्वर में अपने गुरु महर्षि बाल्मीक रचित  

"श्री रामायण महाकाव्य " को सुनकर उन्हें बड़ा कौतूहल हुआ -- फिर पुरुष सिंह राजा श्री राम जी ने बड़े बड़े मुनियो ,राजाओ , वेद वेत्ता पंडितों , संगीत के विद्वानों आदि सभी व्यक्तियों की सभा बुलाकर श्री राम ने श्री रामायण का गान करने वाले उन दोनों बालको को उस मे बैठाया --

      मुनिकुमारो के गायन शुरू करते ही मधुर संगीत का तार बंध गया --उस अलौकिक गान को सभी श्रोता मुग्ध होकर सुनते रहे पर उनकी तृप्ति नही हुई - उस दिन दोनो कुमारो ने 20 सर्गो तक का गान किया ,तब श्री राम ने भाई भरत से दोनों मुनिकुमारो को अठारह अठारह हजार स्वर्ण मुद्राएं देने व और जो भी उन बालकों की और इच्छा हो पूरी करने को कहा - परंतु दोनो लव और कुश ने कुछ भी लेना स्वीकार नही किया और बोले --

      🎈" इस धन की हमें कोई आवश्यकता नहीं है - हम वनवासी है , जंगली फल मूल खाकर निर्वाह करते है --सोना चांदी वन में ले जाकर क्या करेंगे ? ""

       इस प्रकार श्री रघुनाथ जी-- ऋषियों राजाओ और वानरों के साथ वह उत्तम रामायण का गान कई

 दिनों तक सुनते रहे । 


     🎈उस कथा से ही उन्हें मालूम हुआ कि कुश और लव दोनो कुमार सीता के ही पुत्र है --यह जानकर श्री राम जी ने दूतों को बुलाकर उनके द्वारा महर्षि बालमीक के पास सन्देश भेजा -


     🎈" यदि सीता का चरित्र शुद्ध है ,तो वे आप महामुनि की अनुमति ले कर यहां आकर जनसमुदाय में शपथ ग्रहण करके अपनी शुद्धता प्रमाणित करे ""---- 


   दूतों की बात सुनकर अग्नि के समान तेज से प्रकाशित हो रहे महर्षि बाल्मीक बोले -

     🎃" ऐसा ही होगा , तुम लोगों का भला हो ,श्री रघुनाथ जी जो आज्ञा देते है सीता वही करेंगी क्योंकि पति स्त्री के लिए देवता है "

      दूसरे दिन श्री सीता जी की शपथ देखने के लिए , वशिष्ठ वामदेव ,दुर्वासा ,विश्वामित्र आदि तमाम ऋषिगण ,महापराक्रमी वानर , राक्षस , ब्राह्मण व जनता एकत्रित हुई -- 

      महर्षि बाल्मीक , सीता जी को लेकर वहां आये --उस समय समस्त लोगो का ह्रदय दुख से व्याकुल था - श्री बाल्मीक जी बोले --

     🎆🍎 "" श्री राम ! यह सीता उत्तम व्रत का पालन करने वाली धर्म परायणा है - लोकापवाद से डरे हुए आपको -- आपकी आज्ञा पाते ही सीता अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाएगी -- ये दोनों कुमार कुश और लव जानकी के गर्भ से पैदा हुए आपके जुड़वां पुत्र है --और आपके ही समान दुर्घष वीर है - मैं प्रेचेता #वरुण का दसवां #पुत्र हूँ , मैने कभी असत्य नही बोला है और कई हजार वर्षों तक तपस्या की है - अगर मिथिलेश कुमारी में कोई दोष हो तो मुझे तपस्या का फल न मिले ""

      ( महर्षि बाल्मीक - प्रेचेता वरुण जी के पुत्र थे )

      🌎 श्री राम जी बोले कि उन्हें महर्षि बाल्मीक के वचनों और सीता जी पर पूर्ण विश्वास है , तथापि जन समाज के बीच विदेहकुमारी की विशुद्धता प्रमाणित होने पर उन्हें अधिक प्रसन्नता होगी -- तब तपस्विनी की भांति गेरुआ वस्त्र पहने श्री सीता जी हाथ जोड़ कर बोली --


       🎃" यदि मैने श्री राम के अलावा किसी दूसरे पुरुष का मन से भी स्मरण न किया हो , मन वाणी क्रिया से श्री राम की ही आराधना करती हूँ , यदि यह बात सत्य हो तो पृथ्वी देवी अपनी गोद में मुझे स्थान दे "" 


      🎆🍎 श्री सीता जी के शपथ लेते ही वहां धरती फट गयी और भूतल से एक अदभुत दिव्य रत्नों से विभूषित सिंहासन जिसे पराक्रमी #नागों ने दिव्य रूप धारण करके अपने सिर पर धारण कर रक्खा था प्रकट हुआ --पृथ्वी की #अधिष्ठात्री #देवी भी दिव्य रूप से प्रकट हुई --उन्होंने मिथलेश कुमारी सीता जी को दोनो हाथो से अपनी गोद में उठा लिया -और स्वागतपूर्वक उनका #अभिनन्दन करके उन्हें उस सिंहासन पर बिठा दिया -- सिंहासन पर बैठकर सीता जी रसातल में प्रवेश करने लगीं --

      उस समय देवता लोग उनपर दिव्य पुष्पो की वर्षा करते हुए ,कहने लगे --


    🎈" धन्य हो ! धन्य हो ! सीते तुम धन्य हो ! तुम्हारा शील स्वभाव रत्न सुंदर और पवित्र है ।""


       🍓 श्री सीता जी का रसातल में प्रवेश देखकर सभी हक्के बक्के और आश्चर्य चकित रह गए --परंतु भगवान श्री राम , कुछ देर तक रो रो कर आंसू बहाते रहे फिर क्रोध और शोक से युक्त होकर बोले --

       🌰 " आज मेरा मन अभूतपूर्व शोक में डूब रहा है ,क्योकि इस समय मेरी आँखों के सामने , मूर्तिमती लक्ष्मी के समान सीता अदृश्य हो गयी है --पहली बार सीता समुद्र के उस पार जाकर मुझसे दूर हुई थी तब मैं उन्हें वहां से लौटा लाया तो अब पृथ्वी के भीतर से लाना कौन सा कठिन है" -- फिर वे पृथ्वी से बोले --


        🎃 "पूजनिये भगवती वसुन्धरे ! मुझे सीता को लौटा दो ! अन्यथा मैं अपना क्रोध दिखाऊंगा --यदि इस पृथ्वी पर तुम उसी रूप ने सीता को वापस लाकर नही दोगी , तो मैं पर्वत और वन सहित सारी भूमि का विनाश कर डालूंगा -फिर भले ही सब कुछ जलमय हो जाये ।"


           तब देवताओ सहित श्री ब्रम्हा जी ने आकर श्री राम से कहा --

        🍓 " उत्तम व्रत का पालन करने वाले श्री राम ! आप मन मे सन्ताप न करें --इस समय आप ध्यान के द्वारा अपने पूर्व उत्तम #वैष्णव स्वरूप का स्मरण करें -- 

       🎈परम् शुद्ध साध्वी सीता आपके ही परायण रहती है और यही उनका तपोबल है -- वे सुखपूर्वक नाग लोक के बहाने आपके #परमधाम को चली गयी है --अब पुनः साकेत धाम में आपकी उनसे भेंट होगी --


        🎁 दूसरे दिन श्री राम जी ने ऋषियों मुनियो को बुलाकर , श्री कुश और लव द्वारा रामायण महाकाव्य का शेष भाग उत्तर कांड के गायन को सभा में सुना --फिर यज्ञ में आये हुए महर्षियों , वानरों , राक्षसो आदि सभी को श्री राम ने विधिवत बिदा किया --श्री राम ने अनेको यज्ञों आदि का अनुष्ठान किया और आवश्यकता जब जब होती थी , वे सीता जी की स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे


         अपने पुत्रों कुश और लव के साथ रहते हुए श्री राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया 

*********** ******* अपनी बात *******

   🎆🎈 पृथ्वी माता ही भगवान श्री राम को अवतार के कार्यो में सहयोग करने के लिए सीता जी के रूप में जनक जी के राज्य में पृथ्वी से ही अवतरित हुई थी-अपने अवतार कार्य की समाप्ति ( निशाचरों का वध और दोनों बच्चों लव कुश का पालन पोषण ) पर उन्हें वापस जाना ही था - इसलिए उन्होंने वापस पृथ्वी रूप में जाने के लिए ही ऐसी शपथ ली थी ।

       ************ क्रमशः ******* ***** राम नाथ गुप्त कन्नौज ,**************

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