श्री रामायण जी की कथाएँ 137


 पोस्ट - ( 137 )-- श्री रामायण जी की कथाएँ -- राजा " इल " , महर्षि बुध और राजा पुरुरवा की कथा ---

 श्री बाल्मीक रामायण - उत्तर कांड - सर्ग 87 / 89 तक - 

     🍎अश्वमेध यज्ञ की महिमा के सम्बंध श्री लक्ष्मण जी से तारकासर / इंद्र की कथा सुनने के बाद प्रभु श्री राम जी ने हंसते हुए लक्ष्मण जी से कहा कि इसके अलावा एक और कथा राजा इल की भी प्रसिद्ध है - 


      पूर्व काल मे प्रजापति कर्दम के पुत्र श्री मान " इल " बाह्रीक देश के राजा थे - वे धर्मात्मा राजा सारी भूमि को अपने वश में करके पुत्र समान राज्य की प्रजा की सेवा करते थे --एक बार सेवक ,सवारियों और सेना के साथ राजा इल शिकार खेलने वन में गए थे , वहां अकस्मात वे सब उस प्रदेश में चले गए जहां भगवान #शंकर , पार्वती जी के साथ #विहार कर रहे थे - 


      🎈उस वन मे जहां जहां पुरुष नामधारी जंतु या वृक्ष थे वे सभी #स्त्री रूप में परिवर्तित हो गए थे - राजा इल ने वहां पहुंचकर स्वयम को तथा सभी साथी सैनिको , सेवको को स्त्री रूप में पाया - यह देखकर राजा को बहुत दुख हुआ और यह जानकर कि यह सब भगवान भूतनाथ शिव जी के नाराज होने के कारण हुआ है वे भयभीत हो गए और फिर तब राजा इल , पार्वती जी के साथ भगवान शंकर की शरण मे गए व कातर भाव से उनकी स्तुति की - भगवान शंकर बोले --


      "कर्दम कुमार महाबली राजर्षि ! उठो उठो ! #पुरुषत्व को छोड़कर जो वर चाहो मांग लो " 


    🍎 शिव जी के वचन सुनकर राजा और व्याकुल हो गए , तब उन्होंने मां पार्वती की शरण ली -- राजर्षि इल के हार्दिक अभिप्राय को जानकर रुद्र प्रिया जगतजननी बोली --" तुम पुरुषत्व की कामना करते हो , इस वर के आधे भाग के दाता तो भोलेनाथ ही है , मैं केवल आधे भाग का वर दे सकती हूँ - अब तुम जीवन के आधे भाग में पुरुष और आधे में स्त्री रूप मे रहोगे " - 

      फिर राजा की इच्छानुसार भगवती ने उन्हें एक माह पुरुष और एक माह स्त्री बन कर रहने का वर दिया तथा कहा कि एक रूप में होने पर उन्हें दूसरे रूप की स्मृति नही रहेगी -


        फिर उस प्रथम मास में राजा इल , त्रिपुर सुंदरी नारी होकर सेविकाओं के साथ वन मे विचरने लगी - वही पास में एक बहुत सुंदर सरोवर में जल के भीतर , सोम पुत्र ऋषि " बुध " तपस्या करते थे - उन अत्यंत तेजस्वी महर्षि को देखकर इला चकित हो गयी और अपनी सहेलियों ( पूर्व में सैनिको सेवको ) के साथ जल क्रीड़ा करने लगी -उस परम सुंदरी को देखकर " बुध " मोहित हो गए -जल से निकलकर उन्होंने सेविकाओं से परिचय पूछा


     🎈 फिर सभी सेविकाओं को पर्वत के किनारे किन्नर होकर रहने की आज्ञा दी तथा उन्हें वर दिया कि वे सब भविष्य में किंपुरुष नामक पतियों को प्राप्त कर लेंगी -जब वे सब किन्नरियां पर्वत के किनारे रहने चली गयी तब बुध ने इला से प्रणय निवेदन कर विवाह कर लिया ।


       🍎एक माह बीतने के बाद सुबह सो कर उठने पर इला फिर पूर्व रूप में ""राजा इल "" हो गए तब आश्चर्यचकित होकर उन्होंने अपने सेवको सैनिको के बारे में पूछा -मुनि बुध ने बहाना बना कर उन्हें समझा दिया था और उनसे वही आश्रम पर एक वर्ष तक रहने को कहा - इस तरह एक माह पुरुष तथा एक माह बुध की प्रेयसी इला बन कर रहते हुए इला ने बुध के तेजस्वी पुत्र " पुरुरवा " को जन्म दिया -


       श्री राम जी ने भरत और लक्ष्मण जी को कथा सुनाते हुए बताया -जब एक वर्ष बीतने के करीब था तब महर्षि बुध ने राजा इल के हित का कार्य करने के लिए विचार करके महामुनि सम्वर्त आदि ऋषियों को बुलाया व उनकी राय मांगी - तभी इल के पिता महातेजस्वी प्रजापति कर्दम मुनि भी वहां आये और बोले -


-🎃🎃" मैं भगवान शंकर के सिवा किसी और को नही देखता जो इस रोग की दवा कर सके- तथा अश्वमेध यज्ञ से बढ़ कर दूसरा कोई ऐसा यज्ञ नही है जो शिव जी को प्रिय हो - इस लिए हम लोग राजा इल के हित के लिए अत्यंत दुष्कर अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करे ""


      🍎 फिर महामुनि सम्वर्त के शिष्य राजा मरुत्त ने वहां बुध के आश्रम के निकट - अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया -- यज्ञ सम्पूर्ण होने पर परमानन्द से परिपूर्ण हुए प्रसन्न चित्त उमापति ने राजा इल को #पुरुषत्व प्रदान कर दिया - इल सदा के लिए पुनः पुरुष हो गए - फिर राजा इल ने गंगा यमुना के संगम के निकट

 "प्रतिष्ठान पुरी "की स्थापना की --राजा इल के बाद बुध और इला के पुत्र पुरुरवा वहां के शाशक हुए -


       🎈 इस प्रकार श्री राम ने भरत और लक्ष्मण जी को अश्वमेध यज्ञ की महिमा बतायी और स्वयम भी अश्वमेधयज्ञ करने का निश्चय किया--

         *********** क्रमशः ******** राम नाथ गुप्त कन्नौज **********

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