पोस्ट --( 135 ) श्री रामायण जी की कथाएँ - 🎈वह भयँकर श्राप जिसके कारण दण्डक वन का छेत्र लाखों वर्ष बाद आज भी शापित होकर भयँकर और डरावना है ।🎈
श्री बाल्मीक रामायण -- उत्तर कांड सर्ग 79 से 81 तक
🎈 दण्डक वन पुनीत प्रभु करहू । उग्र श्राप मुनिबर कर हरहु ।। ( राम चरित मानस - अरण्य कांड )
🍎 जब भगवान श्री राम ने श्री अगस्त्य मुनि से अपने निवास करने योग्य स्थान के बारे में पूछा था तब उन्होंने श्री राम को मुनि के #उग्रशाप से #दग्ध #दण्डकारण्य वन में पंचवटी में रहने को कहा था -- क्या कभी विचार किया कि किस मुनि द्वारा और क्यो श्रापित वह स्थान था ?
🍎🎆 वह भयंकर श्राप -- जिसके कारण हजारो वर्षो बाद दण्डकारण्य वन ( दंतेवाड़ा ) का छेत्र आज भी शापित होकर भयंकर और डरावना है ?
राजा श्वेत की कथा सुनने के बाद श्री राम ने महर्षि अगस्त्य जी से पूछा कि राजा श्वेत ने जिस निर्जन भयंकर वन में तपस्या की थी , वह इतना भयंकर व मनुष्यो से रहित क्यो है ? -श्री अगस्त्य जी ने बताया --
🍎 "श्री ब्रम्हाजी के पुत्र मनु और मनु के पुत्र महाराजा इच्छवाकु ने सूर्य वंश की स्थापना की थी - उन्ही राजा इच्छवाकु का सबसे छोटा पुत्र कुछ उद्दंड स्वभाव का था ,इस लिए उसका नाम भी " दण्ड " ही पड़ गया था -- पिता महाराजा इच्छवाकु ने विन्ध्य पर्वत और शैवाल की पहाड़ियों के बीच का स्थान दण्ड को राज्य करने के लिए दे दिया --दण्ड ने उस जगह अपने विशाल और अति समृद्ध साम्राज्य "" मधुमन्त "की स्थापना की - और अपना पुरोहित महर्षि शुक्राचार्य जी को बनाया ।
🍎 महाराजा दण्ड ने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखकर बहुत लंबे समय तक वहां अकंटक राज्य किया । एक बार राजा दण्ड , मनोरम चैत्र मास में शुक्राचार्य के रमणीय आश्रम पर गया -- वहां शुक्राचार्य की सर्वोत्तम सुंदरी कन्या "अरजा" वन प्रांत में विचरण रही थी --उसे देखते ही खोटी बुद्धि वाले राजा दण्ड ने काम से पीड़ित होकर ,उसके लाख समझाने और मना करने के बाबजूद , उसके साथ #जबरन #बलात्कार किया --
एक शिष्य द्वारा समाचार पाकर , मुनि शुक्राचार्य ने वहां आकर , अपनी पुत्री की दुर्दशा देखी तब अत्यंत कुपित होकर वे बोले --
"" 🎆🎈शास्त्र विपरीत आचरण करने वाले अज्ञानी राजा दण्ड को मेरी ओर से अग्नि शिखा के समान घोर विपत्ति प्राप्त होगी --इस दुर्बुद्धि और दुरात्मा राजा ने सेवको सहित प्रज्वलित अग्नि को गले लगा लिया है --
" 🎆🎈 पाप कर्म और दुराचरण करने वाला यह दुर्बुद्धि नरेश सात रात्रि के भीतर , पत्नी ,पुत्र ,सेना सवारियों सहित नष्ट हो जाएगा -- खोटे विचार वाले इस राजा के सम्पूर्ण राज्य को , जो सब ओर से 100 योजन लम्बा चौड़ा है --देवराज इंद्र भारी धूल की वर्षा करके नष्ट कर देंगे --यहां जो सब प्रकार के स्थावर जंगम जीव निवास करते है , इस धूल भरी वर्षा से सब नष्ट हो जाएंगे --
इसके बाद मुनि शुक्राचार्य ने सभी आश्रम वासियो से दण्ड के राज्य से दूर जाकर निवास करने को कहा और वे वहां से चले गये । उनके श्राप से वह पूरा राज्यं नष्ट हो गया ।
🎆 महर्षि अगस्त्य बोले -- श्री राम ! #दण्ड के नाम पर ही स्थान का नाम बाद में #दण्डकारण्य
( दण्ड +अरण्य - वन = दण्डकारण्य = आज का पांच राज्यों में विस्तारित दन्तेवाड़ा का छेत्र ) पड़ गया -- बाद में मुनियो ने यहां आश्रम बनाये और इसे " जन स्थान" भी कहा गया है
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🎈कितने आश्चर्य की बात है , रामायण काल , मे भी दण्डकारण्य दुर्गम स्थान था तथा राक्षसो का निवास स्थान भी था और लाखों वर्षों बाद आज भी मुनि शुक्राचार्य के घोर श्राप से मुक्त नही हो पाया है -- आज भी यह दंतेवाड़ा आदि का 5 राज्यो में फैला दुर्गम इलाका है और नक्सलिस्ट व अपराधियो का निवास स्थान है जहां अक्सरकर सुरक्षा जवानों पर आक्रमण होते ही रहते है
***क्रमशः*** राम नाथ गुप्त कन्नौज ***********

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