पोस्ट ~~( 134 ) श्री रामायण जी की कथाये ---- महर्षि सौभरि की कथा ~~~
नाथ विषय सम मद कछु नाही । मुनि मन मोह करइ छन मांही ।।
🍎 वृन्दाबन के निकट कालिंद्री के तट पर रमणक नामक द्वीप में महर्षि सौभरि रहते थे -वे सदा जल के अंदर समाधि लगाकर तपस्या करते थे ~एक बार जल के अंदर समाधि भंग होने पर मछलियो को परिवार सहित क्रीड़ा करते अत्यंत प्रसन्नता की हालत में देखकर कुसंग से उन्होंने सोचा कि उन्हें भी परिवार के साथ आनंद भोगना चाहिए । यह विचार आते ही वे प्राणायाम ,जल समाधी सब भूल गए और सीधे अयोध्या के राजा मान्धाता के पास पहुंचे और गृहस्थ सुख पाने के लिए उनसे उनकी 50 कन्यायो में से एक की मांग की।
राजा मान्धाता ~ऋषि की अत्यंत वृद्धावस्था को देखकर और न कहने पर श्राप के डर से सहम गए । इस विषम स्थिति में राजा ने सोचा कि इतने वृद्ध को कोई कन्या हां क्यों कहेगी~ इस लिए राजा ने ऋषि को महल में यह कह कर भेजा ~ कि जो कन्या उन्हें पसंद कर लेगी ~ उसी से वे ऋषि का विवाह कर देंगे ।
🎈राजा के मन की बात ऋषि समझ गए । राजमहल में जाते समय ऋषि सौभरि ने तपोबल से अपने शरीर को अत्यंत सुन्दर और नवयुवक के रूप में बदल लिया । महल में मौजूद पचासो राज कुमारियां ऋषि पर मोहित हो गयी और सभी 50 राजकुमारियो से ऋषि का विवाह हो गया ।
🍎 आश्रम पर आकर ऋषि ने विश्वकर्मा को बूलाया और स्वर्गीय सुख सुविधाओ से युक्त 50 राजमहल बनाने की आज्ञा दी । फिर ऋषि ने तपोबल से अपने 50 रूप बनाकर सभी पत्नियो के साथ सुखभोग किये । सभी से 10~~10 संताने हुई और फिर पौत्र हुए ।
🎈 एक दिन अचानक ऋषि सौभरि का मोह भंग हुआ कि अत्यंत कठिन तपस्या से प्राप्त दुर्लभ सिद्धियो को इस प्रकार नष्ट हुआ देख उनके मन में बहुत ग्लानि हुई और वे सब कुछ छोड़ कर वन में तपस्या करने चले गए ।
*********** अपनी बात ****** व्याख्या ****
मछलियो को देखकर मतिभ्रम और कैसा विकट मोह जिसमे जीवन भर की तपस्या गँवा दी~~
भगवान् शंकर माँ पार्वती से कहते है~राम चरित मानस उत्तर काण्ड दोहा 62 ~~
🍎 प्रभु माया बलवंत भवानी । जाहि न मोह कवन अस ग्यानी ।।
ग्यानी भगति सिरोमनि -त्रिभुवन पति कर जान ।
ताहि मोह माया नर पाँवर करहि गुमान ।।
शिव बिरंचि को मोहई को हई बपुरा आन ।
अस जिंय जानि भजहि मुनि -मायापति भगवान् ।।
प्रभु की माया ~शिव ब्रम्हा ग्यानी भगत शिरोमणि सब को मोह लेती है ~मूर्ख मानव उसके सामने क्या है -इसी लिए मुनिगण मायापति भगवान् का भजन करते है ।
********** क्रमशः ********** राम नाथ गुप्त ****************

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