पोस्ट --( 133 ) - श्री रामायण जी की कथाएँ -- स्वर्ग के वासी - राजा श्वेत - जिन्हें अपने ही मृत शरीर को खाकर भूख मिटानी पड़ती थी !! श्री बाल्मीक रामायण -- उत्तर कांड --सर्ग - 77 से -78--
श्री राम चरित मानस के अनुसार
.🎈 ""-प्रगट चारि पद धर्म के कलि मे एक प्रधान ।
जेन केन बिधि दीन्हे दान करइ कल्याण ।।""-
दान और उसमे भी अन्न दान -भूखे को दो खाना -का बहुत महत्त्व है
🍎 बाल्मिक रामायण में उत्तर काण्ड 77-78 सर्ग के अनुसार -- अयोध्या के राज भवन में महर्षि अगस्त्य जी श्री राम को कथा सुनाते हुए कहते है कि एक बार वे घूमते हुए तपस्या करने के लिए एक विशाल वन जिसमे बहुत बडा निर्मल पानी से भरा सरोवर था वहां गए । वहाँ एक विशाल अद्भुत पवित्र पुराना आश्रम था जिसमे कोई तपस्वी नहीं था। उस अमावस्या की रात को अगस्त्य जी उसमे रुके और सुबह जब स्नान करने के लिए सरोवर की और जा रहे थे तो उन्होंने एक हष्ट पुष्ट शरीर का ताजा शव वहा देखा ।
🍓 तभी एक दिव्य अद्भुत वेगशाली विमान वहाँ उतरा , जिसमे एक अत्यंत रूपवान स्वर्गवासी देवता और उनके साथ मंगलगीत गाती हुई तमाम अप्सराए बठी थी ।
तभी वे देवता विमान से उतर कर वहा पडे़ शव को खाने लगे , फिर जब वे जाने लगे तो श्री अगस्त्य जी ने उनसे इतने घृणित शव आहार करने का कारण पूछा ।
🍎 " देवता ने कहा की पूर्व काल में वे विदेह देश के राजा सुदेव के पुत्र " श्वेत " थे -काफी समय तक धर्मपूर्वक राज्य करने के बाद इसी वन में इसी आश्रम पर तपस्या करते हुए उन्होने शरीर छोडा । यह मृत शरीर उनका ही है "।
" मरने के बाद स्वर्ग लोक पहुँचने पर वे भूख प्यास से व्याकुल हो गए जब कि वहाँ भूख प्यास नहीं लगती है -- तब पूछने पर ब्रम्हा जी ने बताया कि--
** 🎈 " जीवित अवस्था में उन्होंने केवल अपने शरीर का ही पोषण किया है , दान और -अन्न दान नही दिया है इसलिए सत्कर्मो से ब्रम्ह लोक आने के बाद भी भूखे हो " **
🎈 ** -जिस शारीर का तुमने पोषण किया उसी शरीर को खाने से तुम्हारी भूख मिटेगी । वह शरीर न तो कभी ख़राब होगा और न ही ख़त्म होगा **
" मै इससे भूख मिटाने रोजाना आता हूँ " - वे देवता -- राजा श्वेत बोले ।
🎈 दान विशेषतया अन्न दान न करने पर एक अत्यंत धार्मिक तपस्वी राजा की इतनी अधम गति हुई- वह देवता स्वरूप व्यक्ति फिर बोला --
🎆 "" मुने ! कुम्भज ऋषि ( अगस्त्य ) ही मेरा उद्धार कर सकते है यह ब्रम्हा जी ने मुझे बताया था ,- आप कुम्भज ऋषि ही है इस लिए आप मेरा उद्धार करने के लिए मुझसे इस आभूषण का दान स्वीकार करें --और आपका कृपा प्रसाद मुझे प्राप्त हो ""--
🍎🌎 ""ब्रम्हर्शे ! यह दिव्य आभूषण , स्वर्ण ,धन ,वस्त्र ,भोजन तथा अन्य अनेक प्रकार के भोग्य पदार्थो को भी देता है -मुनि श्रेष्ठ ! इस आभूषण के द्वारा , मैं समस्त कामनाओ , और भोगो को भी दे रहा हूँ -""🎈
स्वर्गीय राजा श्वेत की यह दुखभरी बात सुनकर , श्री अगस्तय जी ने उनसे वह दिव्य आभूषण ले लिया
🎃-- और जैसे ही उन्होंने वह दान स्वीकार किया --तुरन्त ही राजा श्वेत का वह पूर्व मृत शरीर अदृश्य हो गया --
उस शरीर के अदृश्य होते ही वे देवपुरुष राजा श्वेत , पूर्णतया तृप्त और सन्तुष्ट होकर विमान से देवलोक को चले गए
महर्षि अगस्त्य ने उस दिव्य आभूषण को भगवान श्री राम को भेंट करते हुए कहा --
🎆🍎" नर श्रेष्ठ रघुनन्दन ! आप भी राजा होने के कारण , सभी लोकपालों के तेज से सम्पन्न है -अतः प्रभो ! इंद्र सम्बन्धी तेजोभाग के द्वारा आप मेरे उद्धार के लिए यह आभूषण ग्रहण कीजिये ! आपका भला होगा ""--
************ अपनी बात *******
सरदार लोगो के प्रमुख गुरुद्वारों में बराबर भोजन के लंगर चलते है -हम लोगों भी खूब दान , बिना यह देखे कि वह दान पाने के योग्य है या नही ,या जहाँ चाहे देते रहते है , परन्तु भूखो को भोजन दान लंगर जो हर प्रमुख शहर में ,हर बड़े मंदिर में होना चाहिए वे बहुत कम है -- इसपर सभी धर्मार्थ में लगे हुए भाइओ को धयान देना चाहिए
********* क्रमशः ******* राम नाथ गुप्त कन्नौज ******

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